राजेन्द्र घायलका केही मुक्तकीय टुक्राहरूः

Rajendra, Siluwal, Ghayal, राजेन्द्र घायल, pallawa, पल्लव

राजेन्द्र घायल

हामीहरू कहिल्यै जुट्न सकेनौ
त्यही भएर माथि उठ्न सकेनौ
पट्पटी चर्की फुट्यौं धाँजा फाटेर
एकताको मूल भै फुट्न सकेनौ ।

धेरै पछि बन्द हुँदा लाग्यो चाड आए जस्तो
थकीत यो शरीरले अढेश आड पाए जस्तो
घडी पनि हेरिएन अफिस ड्रेस नि फेरिएन
बेफुर्सदी जिन्दगीले पल्टिने टाँड पाए जस्तो ।

 

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गजल

Nirih, Rajendra, निरीह राजेन्द्र, pallawa, पल्लव

निरीह राजेन्द्र

मैले लिए देखि उनले पीडा दिए देखि
ढलेको जिन्दगी उठेर फेरि उभिए देखि

अचेल मन्दिर देख्दा पनि घृणा लाग्छ
पुकार्दा पनि भगवानले बिर्सिए देखि

यी सराब को पनि भर लागेन खै अब
पिउदा पनि उसलाई नै सम्झिए देखि

 

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गजल

Nirih, Rajendra, निरीह राजेन्द्र, pallawa, पल्लव

निरीह राजेन्द्र

हराउँदै जान्छ आफ्नोपन माटोमा पनि
गए पछि टाढा जीवन को बाटोमा पनि ।

तिमी नुन चुक छर्किन्छौ बेला बेलामा
निको हुदै गरेको घाउको खाटोमा पनि ।

अन्याय अत्याचार ले सिमा नाघे देखि
चेतना आएको छ अचेल लाटोमा पनि ।

 

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गजल

Rajendra, Upadhyaoa, Bajhangi, राजेन्द्र उपाध्याय बझाङ्गी, pallawa, पल्लव

राजेन्द्र उपाध्याय बझाङ्गी

आमा भन्नुहुन्छ बुहारी चाहियो
आवश्यक त मलार्इ पनि थियो

खोजेर चाहेको नभेटेपछि आज
फुल जस्तै यो मुहार ओइलियो

नानाथरी का सपना सजाएर
व्यर्थ कसैको पर्खाइमा बसियो

 

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‘स्वार्थको खेल भयो धरामा’

Rajendra, Paudel, राजेन्द्र पौडेल, pallawa, पल्लव

राजेन्द्र पौडेल

कैले रुदै धर्धर बित्छ रात
भल्को फुटी आउछ भित्र बाट
वेचैन भै छट्पटिदै छु आज
देखेर स्वार्थी हरूको समाज ।

माया र सद्भाब सबै छिनाले
आफ्नै हरू सत्रु भई दिनाले
देखाउछन् तान्डब नृत्य आज
के फायदा हुन्छ फुटी समाज ।

 

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राजेन्द्रका केही मुक्तक

Rajendra, Paudel, राजेन्द्र पौडेल, pallawa, पल्लव

राजेन्द्र पौडेल

कैले प्रेमिल शब्दले हृदयका खोल्छ्यौ हजारौं कुरा
कैले फन्फन फन्किएर रिसले सुर्‍क्याउछ्यौ पाखुरा
मैले जानिन मर्म बुझ्न अथवा जानेर गल्ती गरें
जे गर्दा पनि शान्ति छैन मनमा अन्योलमा पो परें

कस्ले पार्योन होला यस्तो
लाग्यो हारे हारे जस्तो
आफैँ हार्दा के हुन्थ्यो र
देशै हार्दा कस्तो कस्तो

 

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मेरो गण्डकी

Rajendra, Paudel, राजेन्द्र पौडेल, pallawa, पल्लव

राजेन्द्र पौडेल

कास्की स्याङ्जा तनहुँ छ यता लम्जुङ्गै त्यो मनाङ्
गोर्खा मिल्दा अझ गहकिलो गण्डकीको छ शान
माछापुछ्रे शिर छ दरिलो अन्नपूर्णै समाली
मस्र्याङ्दी का कलकल सँगै सेति–मादी र काली

फेवा रुपा रमणिय झनै बेगनासै छ पूर्व
डाँडा पाखा हरित बनले गण्डकी यो अपूर्व
गोर्खाबाटै सब मुलुकको कोरियो मानचित्र
यै धर्तीमा जपतप गरी निस्किए बेद सूत्र

 

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युग का सच

Rajendra, Pardesi, राजेन्द्र परदेसी, pallawa , पल्लव

राजेन्द्र परदेसी

लघुकथा

अस्पताल अभी खुला नहीं था,परन्तु लोग डॉक्टर को दिखाने के लिए कार्ड बनवाने की लाइन में खड़े होकर काउंटर खुलने की प्रतीक्षा कर रहे थे तभी एक महिला अपने पीछे खड़ी प्रौढ़ा से पूछा -आप किसके लिए कार्ड बनवाने आयी है ,

`बेटी के लिए `

` बेटी की ससुराल में कोई नहीं है क्या `

`है सभी लोग है `

 

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हिन्दी लघुकथाः एक और मज़बूरी

Rajendra, Pardesi, राजेन्द्र परदेसी, pallawa , पल्लव

राजेन्द्र परदेसी

पहले तो पार्वती ने सोचा कि वह स्वयं ही बेबी को अस्पताल दिखाने ले जायेंगे ,लेकिन जब उसने देखा कि ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे है और बेबी के बारे में कोई बात नही कह रहे ,तो स्वयं ही बोली -सुनते हो`
`क्या है `
` बेबी ने कई दिनों से खाट ले ली है ,उसे डॉक्टर से दिखा दो न,कुछ हो गया तो जिंदगी भर पछताओगे ,
`अभी तो जल्दी है ,शाम को आऊंगा तो दिखा लाऊंगा ,
`तुम्हे तो हमेशा ही जल्दी रहती है ,
`क्या करू नौकरी ही ऐसी है ,

 

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आज संवेदना की

Rajendra, Pardesi, राजेन्द्र परदेसी, pallawa , पल्लव

राजेन्द्र परदेसी

आज संवेदना की
सभी खिड़किया
बंद हो गयी है
अपनत्व के दरवाजे पर
पहले से ही
ताला लटक रहा है
इसीलिए
प्रेमशब्द
संदर्भहीन है

 

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परदेशीका हिन्दी हाइकुहरूः

Rajendra, Pardesi, राजेन्द्र परदेसी, pallawa , पल्लव

राजेन्द्र परदेसी

आँखे ठहरी
करती इंतज़ार
तुम्हे बुलाती ।

कैसे संभव
तुम तक पहुंचे
संदेशा मेरा ।

बातें करती
चाँद से चुपचाप
काटती रात ।

 

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अधिकारी

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राजेन्द्र परदेसी

वर्मा जी को देखकर रतन लाल ने चाहा की उनकी नज़र के सामने न पड़े, लेकिन वर्मा जी की नज़र बहुत तेज़ थी. भीड़ में भी रतन लाल को ढूढ़ ही निकाला,तुरंत बेटे को भेजकर बुलवाया,साहब आदेश दे या साहब का बेटा आदेश तो आदेश है ,रतन लाल मन मसोलते हुए पास जाकर बोले ,नमस्ते सर ,
यहाँ कहा घूम रहे हो,`नमस्ते के जवाब में साहब ने रोब दिखाते हुए पूछा
सर,घर के लिए सामान ले रहा था ,कल सत्यनारायण जी की कथा हम लोग सुन रहे है न ,
आजकल कथावथा बहुत सुन रहे हो ,क्या बात है ,सन्यासी बनना है क्या ,

 

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चाहो तो

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राजेन्द्र परदेसी

चाहो तो
यादों के बाजार से
तुम भी
कुछ ले लो
प्यार की पैकिंग पर
… … … … डेट न देखो
सावन के
झूले ही ले लो
पेंगो की ऊँचाई में
इसकी कजरी
मेहंदी रचाए मिलेगी
और
यह रही
संबंधों की
बुरादे वाली अंगीठी –

 

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तेरी यादों के सिरहाने

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राजेन्द्र परदेसी

तेरी यादों के सिरहाने
मेरे हाथों की उंगलियाँ
दबी है
तुम्हारी नींदों के पैताने
संतरियों के पाँव
… … खरे है
क्या
प्यार का दरवाजा
किसी को
बहार आने ही नहीं देता
या
फिर किसी का
परवेश निषेध करने को
हमेशा खुला रहता है–

 

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संभव है

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राजेन्द्र परदेसी

मिलाना असंभव हो
पर आभास देकर
मन को
कुछ पल के लिए
शांति ही दे दो
जैसे
धरती और आकाश
दूर
क्षितिज के उस पार
मिलते नही
पर
मिलने का आभास तो देते है,

 

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मेरे भाई

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राजेन्द्र परदेसी

मेरे भाई
तुम्हारा आक्षेप है की
किसी ने
विद्रोह का झंडा नहीं उठाया
सभी नपुंसक हो गए है
स्तिथि स्पष्ट कर दू
ह्रदय में
विद्रोह के बुलबुले उठते है
लेकिन
कुछ अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर
दब जाते है
प्रदर्शन के पहले ही
फ़ूट जाते है

 

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परदेशीका हिन्दी हाइकुहरूः

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राजेन्द्र परदेसी

ठंडी हो गयी
रिश्तों की गर्माहट
युग प्रभाव ।

भाव विभोर
अगम अगोचर
मन नादान ।

खिलौना टूटा
सब हो गये मौन
छाया सन्नाटा ।

 

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परदेशीका केही हिन्दी हाइकुहरूः

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राजेन्द्र परदेसी

कोई लाचारी
जो आस्तीन में सांप
पाले रहती ।

नसीब कैसा
स्तन में दूध नहीं
मनवा भूखा ।

पाती पढ़ते
पाखी बनके मन
उड़ना चाहे ।

 

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पुरुष को . . . . .

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राजेन्द्र परदेसी

पुरुष को
अच्छी नहीं लगती
अपने आगे
तुम्हारी प्रसिद्धि प्रतिष्ठा
उसे सह्य नहीं
तुम्हारे स्वाभिमान का फैलाव
तभी तो
जब तुमने उसके चंगुल से
मुक्त होने का प्रयास किया
उसने
तुम्हारे चरित्र पर ही कीचड़ उछाली
पुरुष प्रधान समाज में–

 

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तेरी यादों के सिरहाने

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राजेन्द्र परदेसी

तेरी यादों के सिरहाने
मेरे हाथों की उंगलियाँ
दबी है
तुम्हारी नींदों के पैताने
संतरियों के पाँव
… … खरे है
क्या
प्यार का दरवाजा
किसी को
बहार आने ही नहीं देता
या
फिर किसी का
परवेश निषेध करने को
हमेशा खुला रहता है

 

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