पूनम पंडित की कुछ पङ्तियाँ

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पूनम पंडित

अचानक हो रहा है कुछ नया सा एहसास।
मचल रहे हैं अरमान, जग रहे हैं सुप्त प्राण।

मन करता है, मैं भी मनाऊँ त्यौहार।
बाँधू राखी, भाई की कलाई पर।
लगाऊँ मंगल टीका, उतारूं नज़र।
तीज मनाऊँ, जाऊँ बाबुल के घर।

लौट जाऊँ , बचपन के आँगन में।
पेड़ों पर झूले डालूँ, झूलूँ सावन में।
विचरूँ उन्मुक्त बाबुल के कानन में।
बच्चों संग अलमस्त खेलूँ आँगन में।

 

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पूनम पण्डित की हिन्दी दो टुक्रे

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पूनम पंडित

एक
तुम ही से माथे का कुमकुम ,
तुम ही से हाथों के कंगन।
मंगलसूत्र तुम ही से सजता ,
तुम ही से पायल की छनछन।

तुम ही से हैं सुबहो शाम ,
तुम ही से महके घर गाम।
रूप -सिंगार तुम ही से सजता ,
तुम ही से महका मन उपवन।

 

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पुनम पण्डित की सुन्दर हिन्दी मुक्तकें

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पूनम पंडित

मन में यही प्रतिज्ञा लेकर सबको आगे आना है।
सबको मिलकर हिंदी भाषा को महकाना है।
आँच आने पाये ना माता के गौरव पर कभी ,
अपनी मातृ भाषा को और समृद्ध बनाना है।

संस्कृत की बेटी है, उर्दू की प्यारी बहना है।
प्यारी हिंदी भाषा सब भाषाओँ का गहना है।
आओ सब मिलकर, प्रण करो साथियो ,
हिंदी भाषा को जन – जन की भाषा बनाना है।

 

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पूनम पंडित की हिन्दी कविताएँ

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पूनम पंडित

कभी याद में, कभी इंतज़ार में ,
जिंदगी यूँ ही तमाम कटती रही।

मन मचलता रहा मै मनाती रही,
इंतजार की घड़ियाँ गिनती रही।
बस याद तुम्हें मै करती रही ,
जिंदगी यूं ही तमाम कटती रही।

 

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