डॉ मिनाक्षी कहकशां की कुछ पङ्तियां की चार टुक्रे हिन्दीमें

Dr, Meenakshi, Kahkashaan, डॉ मीनाक्षी कहकशां, pallawa, पल्लव

डॉ मीनाक्षी कहकशां

१)
सांपो की बस्ती में चलना सम्भल कर
हर इक शख्श यहाँ डसता मचल कर

चूमकर कपोल करता मदहोश तुमको
मारे डंक फिर तेरी जिव्हा कुचल कर

किसी से ना जुर्म उसका तू कह पाए
वास्ते वो जुवां तेरी रखता पकड़ कर

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां का हिन्दी में पाँच कविताएँ

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१) आज मैं
सो रही हूँ
मुझे
जगाना मत
संगतराश
तू बरसों से
जगा रहा है
मुझे
ठोंक ठोंक कर
ज़रा सा भी
नहीं सोचा तूने
की चोट लगती है –

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां का हिन्दी कविताएँ

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

आज
फिर वो फरिश्ता
चुपचाप बैठ गया
मेरे सामने,
निहारता रहा मुझे
मैं सो रही थी
पर कैसे सोती
जैसे चांदनी रात में
सूरज चमक उठा हो,
ऐसे ही उसकी
मुहब्बत भरी किरणें
मेरी पलकों पे पड़ी
और मैं चुँधिया कर
जाग गई,–

 

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