बाबा बिमस्टेकले चकलेट कैले ल्याउँछ ?

Er, Santosh, Kumar, Pokharel, ई. सन्तोष कुमार पोखरेल , pallawa, पल्लव

ई. सन्तोष कुमार पोखरेल

राजधानीका सडकहरू सफा छन्
चार दिनमै खाडलहरू पुरिएछन्
पुलीस प्रहरीहरू निर्बाध
सम्मेलन परिसरतिर धुरिएछन्
सडकहरू खाली खाली छन्
जनताका सडकमा हाली मुहाली छन्
सबैलाई आज मार्गप्रशस्त छ
धुलो धुवाँ बाट मुक्त सडक
प्रदूषणबाट निर्ग्रस्त छ,
यस्ता बिम्स्टेकहरू आइरहून्
हाम्रा नानीहरू निर्बाध उफ्रदै
हाँसिरहून रमाइरहून् |

 

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‘आकाश सोंच’

Santosh, Kumar, Pokharel,ई. सन्तोष पोखरेल, pallawa, पल्लव

ई. सन्तोष पोखरेल

आकाश सोंच
जमीनमा टेकेर
जमीन मात्र सोचे
पाताल पुग्नेछौ
अनि पहिचान छल्न
दस ठाउँ झुक्ने छौ
आफ्नै ईमान फुक्नेछौ
ईमान न बेच ।
यहाँका बेईमान नेता झैं
ईमानको खडेरी लाग्या बेला
जमानको व्यापार जाग्या बेला
फेरि पनि चुक्ने छौ
पाताल पुग्नेछौ।

 

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‘मेरो सपना’

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ई. सन्तोष कुमार पोखरेल

मंगसीर को धान काटेर ज्यापुले चुटेजस्तै
देशलाई चुट्नु सम्म चुट
अनि तलबाट दनकुटी लाएर
देशलाई ताउलोमा भुट
देश त निर्जीव हिमाल र पहाड हो
अनि तराइ हो
यहाँ बस्ने को आफ्नो
र को पराई हो
यो देश हैन मधेश हो
यो देश हैन प्रदेश हो
यो देश नभएर बिभिन्न भेष हो ।

 

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नेपाली शुभेच्छा

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ई. सन्तोष कुमार पोखरेल

(भानु जयन्तिका अवशरमा)
म लेखूँ शृंगार,
बिबिध प्यार बाँडन सकूँ
म देखूँ संसार,
प्रणय पार आँटन सकूँ ।
म सिन्चूँ यै भाषा,
नबिन आशा जाग्छ मनमा
कि नेपाली भाषा,
गर न बासा कोटि जनमा ।।

कहाँ को हीमालि
प्रभृत पाली देख्दछ बरू
कहाँ त्यो लेकाली
जनित बोली हुन्छ बगरू ?

 

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आँसु झरेछ

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ई. सन्तोष कुमार पोखरेल

आँखाबाट आँसू झरेछ
मनबाट कोही झरेछ
म भएछुँ एक सूर
सोचेछुँ दूर दूर
मेरो यौवनै पो टरेछ।
आँखाबाट आँसू झरेछ।।

मैले कति माया लाएँ
अनि कति धोखा पाएँ
जिम्मेवारी बोधले मात्र
कति शास्ती खाएँ
बरालिउँ भन्दा उमेर
डाँडापारी अस्ती सरेछ।

 

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ई. सन्तोष कुमार पोखरेल का तीन रचना

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ई. सन्तोष कुमार पोखरेल

१) एउटा गीत: गायकप्रति  
तिम्रो गीत सुनेर म कति रोएँ
मैले मन पखालें चित्त धोएँ
ती गह्रौं तिम्रा कथा
मुटु भरि उम्लिएकाव्यथा
मनै भित्र कति फेरा
लुकी लुकी छोएँ |

गाऊ तिमी गाऊ
तिम्रो रोदनमा आँसु बगाउला
मेरा पनि भावनाका बाँध लाउँला
फुटे फुटुन् छैन केही
मनको भारी बिसाउला
अनि तिम्रा क्रन्दनमा
मनकोतार बजाउला |

 

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हिन्दीमा लघुकथा: तरकीब

 

Er., Ganesh, Jee,‘Bogee’, र्इ. गणेश जी ‘वोगी’, pallawa, पल्लव

र्इ. गणेश जी ‘वोगी’

ठाकुर साहब की चाकरी करते करते भोलुआ के बाबूजी पिछले महीने चल बसे, अब खेत बघार का सारा काम भोलुआ ही देखता था, बदले मे ठाकुर साहब ने जमीन का एक टुकड़ा उसे दे दिया था जिससे किसी तरह परिवार चलता था । ठाकुर साहब भोलुआ को बहुत मानते थे, सदैव भोलू बेटा ही कह कर बुलाते थे । ठाकुर साहब द्वारा इतना सम्मान भोलुआ के प्रति प्रदर्शित करना उनके बेटे विजय बाबू को जरा भी नहीं सुहाता था । दोपहर को ठाकुर साहब परिवार के साथ बैठ कर भोजन कर रहे थे साथ ही खेत खलिहान की भी बात किये जा रहे थे । मौका देख विजय बाबू आखिर पूछ ही बैठे ,

 

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रक्त पिपासु

लघु कथा :- रक्त पिपासु

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र्इ. गणेश जी ‘वोगी’

“अरे राहुल देख तो, किसी ने फेस-बुक पर अपडेट दिया है कि मुंबई में उसे तत्काल ओ नेगेटिव ग्रुप का ब्लड चाहिए। ”
“लेकिन राजू, यह ग्रुप तो जल्दी मिलता ही नहीं” राहुल ने कहा |
“जरा रुक उसके संपर्क नंबर पर मैं बात करता हूँ।” यह कहते हुए राजू ने अपने मोबाइल से नंबर लगाने लगा |
“हैलो, मैं दिल्ली से राजू बात कर रहा हूँ , आपको ओ नेगेटिव ग्रुप का ब्लड चाहिए ना ?”
“हां जी, मुझे ओ नेगेटिव ब्लड की सख्त जरुरत है, मेरा बेटा आई सी यूं में भर्ती है और यह ग्रुप मिल नहीं रहा, प्लीज आप मदद कीजिए |”

 

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हिन्दी लघु कथा :- सौदा

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र्इ. गणेश जी ‘वोगी’

इशरत गंज उस शहर में देह बाज़ार का नाम था और लैला उस बाज़ार का एक हिस्सा थी । बाज़ार से सटे चौराहे पर मोती लाला की प्रसिद्ध किराना दुकान ।  इशरत गंज के अक्सर सभी घरों में मोती लाला की दुकान से ही सामान जाया करता था | लैला भी एक महीने का राशन एक साथ मंगवा लिया करती थी | आज भी राशन आया था । लैला बिल से एक-एक सामान मिलाती जा रही थी | पिछली बार लाला दो किलो नमक सामान के साथ बांधना भूल गया था । बार-बार कहने पर भी नहीं माना । लाला की भूल लैला पर भारी पड़ी थी |

 

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