‘खाजा कि हुर्मत’ ??

Dr., Bidur, Chalise, डा. विदुर चालिसे, pallawa, पल्लव

डा. विदुर चालिसे

अपाङ्गता !
तिम्रो विवशता थ्यो
मेरो बाध्यता थे
बेलाबेला तिमीलाई देख्थेँ
जम्कामा मुसुक्क हाँसिदिन्थेँ
तिमी अप्ठेरो मानि मानि
लजाउँथ्यौ र तर्किन्थ्षौ कुनैबेला
म रबाफले रेष्टुराँमा भन्किन्थेँ
तिमी टुक्रिएका हातहरू हल्लाउँदै
खरिएर भौतारिन्थ्यौ
मेरा सजल आँखाहरू
तिम्रा निश्चल नजरहरू
किन ? कता कता हरमउँथेँ
म तिमीलाई मन पराउँथेँ
तिमी मलाई मन पराउँथ्यौ ।

 

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मर्मिडकि चेहरा

Dr., Bidur, Chalise, डा. विदुर चालिसे, pallawa, पल्लव

डा. विदुर चालिसे

म समुद्र थेँ
समुद्र विहिन थेँ
तिमी समुद्र थ्याै
समुद्रमा थ्याै
हामी परी थियाैँ
तिमी जलको, म थलको !

म हेर्दथेँ तिम्रो चेहरा
उही चेहरा एेनामा
अाफैलाई देख्दथेँ घरिघरि
बालुवाको खगर छेउ
समालिन्थेँ अाफैमा
मृत नालाको खँगारभित्र
र, उड्दथेँ हिमालको काखमा ।

 

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दूतावासकाे याैनलिला

Dr., Bidur, Chalise, डा. विदुर चालिसे, pallawa, पल्लव

डा. विदुर चालिसे

मातृभूमि !
बन्द सिमाभित्र थ्याै ।
शालिन शक्तिमा रमाउँथ्याै ।
शाहसी पुर्खाकाे धरा
पाखुरामा चम्चमाउँथ्याै ।
चमत्कारमा रमाउँथ्याै
अजीर्ण मनहरूका पलेँटीमा
याैवना सल्बलाउँथ्याै ।
मेराे अादर्श थियाै ।
म युग पुरूष थेँ,
उमरका मधुशालामा
लठ्ठिएका नग्न नशालुहरू
तिम्राे अस्तित्वकाे मन्दिरमा
दूतावासकाे याैनलिला छ ।

 

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निर्णय साभार

Dr., Bidur, Chalise, डा. विदुर चालिसे, pallawa, पल्लव

डा. विदुर चालिसे

तिमी काण्ड थियौ
म प्रकाण्ड थिएँ
तिमी न्यायको नेतृत्व गर्थ्यौ
म निर्णयको साभार गर्थेँ
भुलचूक छिद्राहरूमा
इच्छाहरू जागृत गरेथ्यौ
सलामि प्राप्त निंद्राहरूमा
अाकाङ्क्षाहरू उद्घाटित गरेथ्यौ
म तिमीलाई खुव नियालेर हेर्थेँ
र, तिम्रो सुन्दरतामा प्रताडित हुन्थेँ ।

 

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डा. श्याम न्यौपानेका जोर कविता

Dr., Shyam, Neupane, डा. श्याम न्यौपाने, पल्लव

डा. श्याम न्यौपाने

काविता– १,
शिरमा शुभ्र अौ श्वेत हिमद्युति मनोहर
गिरिकाननको दृष्य मध्यमा अझ सुन्दर
उर्वरा भूमिको फाँट तराई तल्तिरै भयो
हो कि प्रकृतिको लाग्छ अनौठा दिव्य रूप यो

दन्तकाली र दावन्ने बागेश्वरी र मालिका
यहीं दक्षिण काली छन् यहीं बाग्लुङ कालिका
यहीं शैलेश्वरी, पाल्ही यहीं छन् मनकामना
श्रद्धाले गर्दछन् लोक यिनैको नित्य साधना

 

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राज सक्सेना ‘राज’का एक दर्जन हिन्दीमुक्तकहरूः

Dr., Raj, Kishor, Saksena, Saxena, Raj,राज किशोर सक्सेना ‘राज’, pallawa, पल्लव

राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

बेचैन हर जगह थे, हम इस जहां में आकर
सोए नहीं थे कब से,महलों में अपने जाकर ।
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए-कब्र में आ,
कितना सुकूं मिला है, छोटे मकां में आकर ।।

बात जारी है अभी, इसकी र वानी रखिये
रात बाकी है सभी, इसको सुहानी रखिये ।
मोड़ पर क्यूँ भला, छोड़ी है कहानी लाकर,
खत्म ऐसे ना कभी , कोई कहानी करिये ।।

 

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डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क का हिन्दी गीत

dr.,Ajay, Srivastava, Ashk, basti, अजय श्रीवास्तव "अश्क", pallawa, पल्लव

डॉ. अश्क अजय श्रीवास्तव

ख्वाब आँखों से हरगिज मिटाना नही।
तुम मेरे प्यार को आजमाना नहीं।

मन है चंचल बहुत ये तो भटकेगा ही।
चांद के झुरमुटों में तो अटकेगा ही।।
रूप दर्पन में अपना निरखना नहीं।
और निरखना कभी तो परखना नहीं।।
गर परख भी लिए तो बताना नहीं…
तुम मेरे प्यार को आजमाना नहीं।।

 

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हिन्दी गजल

dr.,Ajay, Srivastava, Ashk, basti, अजय श्रीवास्तव "अश्क", pallawa, पल्लव

डॉ. अश्क अजय श्रीवास्तव

कितना करता है असर तूफ़ान देखा जाएगा।।
फिर यहाँ गुलशन मेरा वीरान देखा जाएगा।।

एक अदना फूल हूं बस इतनी है मेरी विसात।
हौसले को तोड़कर गुलदान देखा जाएगा।

राह में शोले हैं जख़्मी पांव खूं से तरबतर।
और फिर आगे सफ़र आसान देखा जाएगा।।

 

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सावधान बनौ . . . . .

dr., Guruprasad, Subedi, डा. गुरुप्रसाद सुवेदी, pallawa, पल्लव

डा. गुरुप्रसाद सुवेदी

भ्यालेन्टाइनको मृत्यु शोकसन्तप्त सैनिक ।
सम्झना उनको गर्दा किन भो हर्ष उत्सव ।

कसैको मृत्युमा मान्छे रुन्छन् वा श्राद्ध गर्दछन् ।
मूर्ख मानिसले मात्रै प्यार गर्छन् रमाउँछन् ।

मृत्युको शोकको बेला प्यारको किन नाटक?
गुफाबफुलले श्राद्ध हुन्छ के भन बालक ।

 

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डॉ. अश्क अजय श्रीवास्तव का रचना की कुछ पंक्तियाँ।

dr.,Ajay, Srivastava, Ashk, basti, अजय श्रीवास्तव "अश्क", pallawa, पल्लव

अजय श्रीवास्तव “अश्क”,

भारत मां को डायन कहने वालों का अभिनन्दन होता।
सत्ता की गलियों में ऐसे लोगों का वंदन होता।।

खून नहीं खौला इस पर भी कैसी यार जवानी है।
है शरीर में लोहू या फिर कह दो केवल पानी है।।

नई इबारत लिखने वालों कैसे चुप रह जाते हो।
गाली देकर राज करे वह कैसे तुम सह जाते हो।।

 

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हिन्दी गजल

dr.,Ajay, Srivastava, Ashk, basti, अजय श्रीवास्तव "अश्क", pallawa, पल्लव

डॉ. अश्क अजय श्रीवास्तव

साथ छूटे न तेरा कभी उम्र भर।
मुस्कुराती रहे जिन्दगी उम्र भर।।

हाथ तेरा पकड़ कर चलें हम सदा।
रूठ पाए न फिर ये खुशी उम्र भर।।

तेरी आँखों कि बीनाई से हमसफर।
मुझको मिलती रहे रौशनी उम्र भर।।

 

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अब भारत है तुम्हें बचाना

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

(डा. राज सक्सेनाका हिन्दी बाल कविता)
अपनों से लुटपिट कर हम तो,
नही लिख सके नया फसाना |
भारत की समृद्ध संस्कृति,
बच्चो अब है तुम्हें बचाना ||

मची हुई है खुली लूट जो,
कैसे उस पर रोक लगेगी |
बापू ने जो सपना देखा,
वैसी दुनिया कभी मिलेगी ?

 

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डा. सक्सेनाका हिन्दी मुक्तकः

Dr., Raj, Kishor, Saksena, Saxena, Raj,राज किशोर सक्सेना ‘राज’, pallawa, पल्लव

राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

एक याद समाई है दिल में, जो आती- जाती रहती है |
जब चाहे कानों में आकर, हर बात तुम्हारी कहती है |
जब भी चाहूँ वह दूर रहे, कुछ और निकट आ जाती है,
यादों से हट बांहों में आ, हर रात सिसकती रहती है |

मलय सा हो गया हल्का, क्षितिज के पार चलता हूं |
छिड़क कर कामना सारी, तुम्हारे नेह का प्रतिकार करता हूं |
सृजन अब कर दिया हमने , नवल संसार का प्रियतम ,
अधिकतम जो दिया तुमने, मैं उस नेह का आभार करता हूँ |

 

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शादी न करना

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

(डॉ. राज सक्सेनाको हिन्दी व्यंग्य कविता)
मिले खेत ख़ाली वहां खूब चरना,
किसी पोखरे से क्षुधा शांत करना |
बताता हूँ मैं बात तुझको पते की,
जो सुधरे कभी न,वो गलती न करना |
हव्वा के आगे तू आदम न बनना ,
मेरे पुत्र जीवन में शादी न करना |

करेगा जो शादी तो पछतायेगा तू,
रोने को कोना नहीं पायेगा तू |
निकलना भी चाहे न निकलेगा बच्चे,
चक्कर में इसके जो पड़ जायेगा तू |
भंवर में फंसे तो नहीं हो निकलना ,
मेरे पुत्र जीवन में शादी न करना |

 

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लीडर न बनना

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

नाले में जाकर कहीं डूब मरना |
किसी ट्रेन के सामने कूद पड़ना |

जैसी भी चाहे, जितनी भी चाहे,
जी भर के प्यारे उछल कूद करना |
सलाह दे रहा हूँ न मेहनत से बचना,
किसी हाल में भी तू लीडर न बनना |

पढाई की प्यारे फिकर अपनी करना |
मन हो तो खेलों की करनी भी करना
नहीं हो अगर कोई अच्छी व्यवस्था,
ठेली लगा कर गुजर अपनी करना |

 

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खेलें ईलू खेल

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

भूलजाओ कुछ देर को,आटा लकड़ी तेल |
आधा सावन जा लिया , खेलें ईलू खेल |

खेलें ईलू खेल, चलो कुछ जश्न मनाएं,
हर चिन्ता को भूल,नैन से नैन लड़ाएं |

कहे ‘राज कविराय’, रोष से पत्नी बोली,
हुई बुढौती उम्र, सूझती तुम्हें ठिठोली |

 

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डा. अजयका केही हिन्दप् मुक्तकहरूः

dr.,Ajay, Srivastava, Ashk, basti, अजय श्रीवास्तव "अश्क", pallawa, पल्लव

अजय श्रीवास्तव “अश्क”,

सुर्ख आंखें थी वो सुर्खियां डाल दी।
राह में मेरी ये बर्छियां डाल दी।।
जा रहा था शहर छोड़कर पांव में।
उसने चाहत कि फिर बेड़ियां डाल दी।।

बढ़ाकर पाँव मंजिल की तरफ रुकना नहीं सीखा।
कभी भी पत्थरों के सामने झुकना नहीं सीखा।।
डराओ मत हवाओं के थपेड़ों से हमें सुन लो।
मुहब्बत का दिया हूँ आज तक बुझना नहीं सीखा।।

 

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डा. सक्सेनाका केही शृङ्गारिक हिन्दी मुक्तकः

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

चली आई बड़े तड़के, मेरे घर पर लिए डोली |
हमारे कान में’अब उठ’किरण कुछ् इस तरह बोली |
मिलन की रात बीती है,मिलन क्षण शेष हैं मन में,
अभी क्यों दे रही दस्तक,अभी आराम कर भोली |

गम-ए-दीदार की बातें, कहाँ पर यार की जायें ?
छुपा कर शोख नजरों से, दरो दीवार की जायें ?
लबों से जब नहीं कहना, निगाहों से सुनाना है-,
चलो फिर ‘राज़’ की बातें, सरे बाज़ार की जायें ?

 

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डॉ. अश्क का हिन्दी मुक्तक

dr.,Ajay, Srivastava, Ashk, basti, अजय श्रीवास्तव "अश्क", pallawa, पल्लव

अजय श्रीवास्तव “अश्क”,

दिल से दिल के रिश्ते को बतलाने आए हैं।
आज तुम्हारे आँसू भी समझाने आए हैं।।
अंधियारी रातों में ही जब वर्षों बीत गए।
बुझा प्रेम का दीपक पुनः जलाने आए हैं।।

यही है शुक्ल की माटी बनी सिरमौर हिन्दी की।
यही माटी है जो अब भी बलंदी पर चमकता है।।
इसी मिट्टी कि खुशबू बस गई मेरे कलम में तो।
मेरे शब्दों का चारो ओर नन्दन वन महकता है।।

 

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क्योंकि वो मेरा अपना है!

dr.,Ajay, Srivastava, Ashk, basti, अजय श्रीवास्तव "अश्क", pallawa, पल्लव

अजय श्रीवास्तव “अश्क”

क्योंकि वो मेरा अपना है!
मैंने उससे थोड़ी नाराजगी क्या जाहिर किया!
तुमने तो फासला ही समझ लिया।
सच कहूँ तुमने जिसे फासला समझा
उस फासले में भी प्यार था
स्नेह और समर्पण था।
उसकी नाराजगी में
गुस्सा नहीं
अपनापन था।
वो मुझे कुछ भी कहे
ये हक भी उसे मैने ही दिया था!
क्योंकि
उसने मुसीबत में भी मेरा साथ नहीं छोड़ा
और सुनो
मैने उसे
ईश्वर से प्रार्थना करते देखा है
कि मेरी सांसें सलामत रहें।

 

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