श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना के छे कविताएँ

Bittu, Kumari, Archana, कुमारी अर्चना, pallawa, पल्लव

कुमारी अर्चना

1) भोजपुरी कविता
लाल लाल टमाटर देखs के
सबके जीव ललचाय हो गोरी
सबके जीव ललचाय

लाल टमाटर खाई के गोरी
लाल गाल दिखलाय हो गोरी
लाल गाल दिखलाय

पड़ल मँहगाई के अइसन मार
टमाटर गईल सौ रूपिया के पार
बिन गर्मी के पारा चढ़ल
सैतालिस के पार उ बढ़ल

 

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श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना का दो कविता

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श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना

१) “अलबेली चली अलबेला ढूढ़ने”
अलबेली की जब शादी की
उम्र हो आई तो / उसको अलबेला ढूढ़ने की सूझी
सोची चुटकी बजा कर / इस पहली को सुलझा दूँगी !
लव और अरैंज के विवाद में उलझी
पर किसको पता था वो
कई वर्षों के वनवास में फंसी !

कभी कॉलेज तो
तो कभी लाइब्रेरी तो
कभी केन्टीन तो
तो कभी पार्क में
कभी कोचिंग में
तो कभी पार्टियों में
फिर ना मिला वे छबिला !

 

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“मावस का अंधेरा” मावस की अंधेर में

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कवयित्री कुमारी अर्चना

चकोर के आने इंतजार में
चाँद रात के द्वार पर खड़ा
कही निगल न लें अंधेरा! ये सब कुछ निगल लेता
पर कुछ पदचिन्ह नहीं छोड़ता
केवल अंधेरे के! किसी की खुशी को
किसी के अरमानों को
किसी के प्यार को
किसी के जहाँ को.. .. पहले चाँद को
धीरे धीरे खाता जाता
फिर चाँदनी को कैद़ करता
फिर सारे तारों की चमक
धूमिल कर देता है!

 

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कुमारी अर्चना की पाँच हिन्दी कविताएँ

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कुमारी अर्चना

१) “कौन पद्मावती”
इतिहास के पन्ने पर
जिसका केवल जिक्र भर ही है
कोई रोमानी कहानी सा लगता
आलाऊद्दीन ने पद्मावती के हुस्न के
जब चर्चे सुनके बाबरा सा हुआ
दर्पण में रूप के दर्शन कर
चितौड़ पर आक्रमण किया
रत्नसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ
पद्मवती ने सतित्व की रक्षा हेतु
जौहर किया और अन्य हरम़ की स्त्रीयों को–
अग्नीकुंड में काया को भष्माभूत करवाया
एक मुठ्ठी केवल राख आलाउद्दीन पाया–

 

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कुमारी अर्चनाके हिन्दी तीन कविताएँ

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कुमरी अर्चना

१) “घर घर शौचालय हो जाये तो”
जॉनी ने कहा अपने मालिक से
मैं टहलने के लिए जा रहा हूँ
इधर उधर चलते चलते
सेर भी हो जाएगी
मैं हलका भी हो जाऊँगा!

तुम भी तो पहले मेरे जैसे
घर से कोसों दूर दूर
जाया करते थे टट्टी करने के लिए !

सेर कर अपने स्वास्थ के साथ
दोस्तों से गप्पे मारा कर
मन का बौझ भी उतारते थे
पर अब तुम दो कमरे के एक कोने में–

 

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“नंगी ही हूँ मैं”

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कुमरी अर्चना

नंगी ही हूँ मैं
कम कपड़ो में
बिन कपड़ो के
तो क्या हुआ
जब पुरूष हो सकते है
तो स्त्री क्यों नहीं?
वैसे तो हर कोई नंगा आता
और नंगा ही जाता है
बस नाम का कुछ बित्तों का
सफेद कफ़न जाता है
वो भी शरीर के साथ
आत्मा तो नंगी की नंगी रह जाती!

 

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“कागज ही तो मैं”

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विट्टु अर्चना

सफेद सी
रंगहीन सी
उजास सी
उपर से नीचे तक एक सी!
कागज सा है मेरा जीवन
कोरा
कुछ प्यार की बूँदे को
छिड़का था जब तुमने
पर भींग ना सका मेरा मन
परती जमीन सा फिर हो गया
ना कोई बीज जमीन की गर्भ में गया
ना कोई पौधा ही उगा सका
बस उजड़ का उजड़ रह गया!

 

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‘काठमाडौंलाई खोज्न जाऊँ’

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अर्चना बराल

खै किन हो
बोलाएन काठमाडौंले
लिएर गएथ्यो उसले
टिपेर मेरै सपनाहरू
समयको राजमार्गमा फूल्दै गरेका
सुदुर आकांक्षाहरूमाथि
बाँडेर गएको थियो उसले
आश्वासनको रुमानी बतास
तर, खै किन हो
बोलाएन काठमाडौंले–

धुलो उड्दै गरेको
दुःखको आँगनमा
पाइला टेकेर एकदिन
भनेथ्यो उसले–

 

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‘यादहरूको कारागार’

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अर्चना बराल

जसरी
छुट्नै लाग्यो समयको रेल,
प्रिय,
छट्पटिएँ म यसरी
जसरी दुई चिरा पार्दैछ मुटुलाई कोही
निदर्यी सिकर्मी
काँटी ठोकेर सेन्ट भ्यालेन्टाइनको
हातपाउ
रगताम्य पार्दैछ कोही तानाशाह
पीडाको गहिराईमा
स्वास पनि टक्क रोकिएको
समयको त्यो मौन क्षण,

 

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प्रायश्चित्त

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अर्चना बराल

के छ त बिचार मैयाॅ? एकैछिनको सन्नाटा चिर्दै उ बोल्यो।नखाउॅ भने दिनभरिको शिकार खाउॅ भने कान्छाबाउको अनुहार भनेझैॅ भयो।सर्त पनि कति हो कति रिसाउन नपाईने रे उसका आमाबुवासॅग झर्कोफर्को गर्न नपाइने रे भनेको सबै मान्नु पर्ने रे मायालु हुनुपर्ने रे …उ बोलिरहेको थियो।हरे शिव! मेरो स्वभाब म केहिदिन परिबर्तन गरौॅला रे अनि त्यसपछि??मलाई थाहा छ म छुच्चि छु मलाई अन्याय मन पर्दैन। बुवाममिसॅग रिसाईरहन्छु।भनेको पनि मान्दिन।मलाई मेरै स्वभाब मन पराउने चाहिएको हो।तर फेरि सोचेॅ आ..जे होला ।।

 

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निराशा ……..

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अर्चना भट्ट

निराश मेरा यी अनुभुति,
अबत भित्रै सडेर गलिसके
चाहना त सबै अधुरा रहन गए
इच्छा आकांक्षा सबै उडिसके

चाहना त मेरो मरिसक्यो
रहरहरु सबै साँघुरी सके
जीन्दगीको फूल अब ओइलिसक्यो
बाच्ने रहरहरु पनि घटी सके

 

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