श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना के छे कविताएँ

Bittu, Kumari, Archana, कुमारी अर्चना, pallawa, पल्लव

कुमारी अर्चना

1) भोजपुरी कविता
लाल लाल टमाटर देखs के
सबके जीव ललचाय हो गोरी
सबके जीव ललचाय

लाल टमाटर खाई के गोरी
लाल गाल दिखलाय हो गोरी
लाल गाल दिखलाय

पड़ल मँहगाई के अइसन मार
टमाटर गईल सौ रूपिया के पार
बिन गर्मी के पारा चढ़ल
सैतालिस के पार उ बढ़ल

 

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कुमारी अर्चना की पाँच हिन्दी कविताएँ

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कुमारी अर्चना

१) “कौन पद्मावती”
इतिहास के पन्ने पर
जिसका केवल जिक्र भर ही है
कोई रोमानी कहानी सा लगता
आलाऊद्दीन ने पद्मावती के हुस्न के
जब चर्चे सुनके बाबरा सा हुआ
दर्पण में रूप के दर्शन कर
चितौड़ पर आक्रमण किया
रत्नसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ
पद्मवती ने सतित्व की रक्षा हेतु
जौहर किया और अन्य हरम़ की स्त्रीयों को–
अग्नीकुंड में काया को भष्माभूत करवाया
एक मुठ्ठी केवल राख आलाउद्दीन पाया–

 

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कुमारी अर्चनाके हिन्दी तीन कविताएँ

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कुमरी अर्चना

१) “घर घर शौचालय हो जाये तो”
जॉनी ने कहा अपने मालिक से
मैं टहलने के लिए जा रहा हूँ
इधर उधर चलते चलते
सेर भी हो जाएगी
मैं हलका भी हो जाऊँगा!

तुम भी तो पहले मेरे जैसे
घर से कोसों दूर दूर
जाया करते थे टट्टी करने के लिए !

सेर कर अपने स्वास्थ के साथ
दोस्तों से गप्पे मारा कर
मन का बौझ भी उतारते थे
पर अब तुम दो कमरे के एक कोने में–

 

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“नंगी ही हूँ मैं”

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कुमरी अर्चना

नंगी ही हूँ मैं
कम कपड़ो में
बिन कपड़ो के
तो क्या हुआ
जब पुरूष हो सकते है
तो स्त्री क्यों नहीं?
वैसे तो हर कोई नंगा आता
और नंगा ही जाता है
बस नाम का कुछ बित्तों का
सफेद कफ़न जाता है
वो भी शरीर के साथ
आत्मा तो नंगी की नंगी रह जाती!

 

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