राज सक्सेनाका एकदर्जन हिन्दी मुक्तकः

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’

बेचैन हर जगह थे, हम इस जहां में आकर ।
सोए नहीं थे कब से, महलों में चैन पाकर ।
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए-कब्र में आ,
कितना सुकूं मिला है, छोटे मकां में आकर ।
आगोशे कब्र = कब्र की गोद

सौ बार ये लगता है किस्मत, दीवार खड़ी कर देती है ।
आसान लग रही राहों में, अवरोध अधिक भर देती है ।
पर सच यह भी दृढनिश्चय ले, साहस से आगे बढो अगर,
होचुकी बाम ये किस्मत ही, पथ को समतल कर देती है ।

 

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“मावस का अंधेरा” मावस की अंधेर में

Bittu, Kumari, Archana, कवयित्री कुमारी अर्चना, pallawa, पल्लव

कवयित्री कुमारी अर्चना

चकोर के आने इंतजार में
चाँद रात के द्वार पर खड़ा
कही निगल न लें अंधेरा! ये सब कुछ निगल लेता
पर कुछ पदचिन्ह नहीं छोड़ता
केवल अंधेरे के! किसी की खुशी को
किसी के अरमानों को
किसी के प्यार को
किसी के जहाँ को.. .. पहले चाँद को
धीरे धीरे खाता जाता
फिर चाँदनी को कैद़ करता
फिर सारे तारों की चमक
धूमिल कर देता है!

 

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हिन्दी गजल

Dr., Raj, Kishor, Raaj Saksena Raaj, राज किशोर सक्सेना ‘राज’, pallawa, पल्लव

राज किशोर सक्सेना ‘राज’

जिन्दगी कुछ इस तरह, अपनी बनाओ दोस्तों |
गम के तूफानों से लड़ , उस पार जाओ दोस्तों |

पूर्ण धरती और गगन, पाने को है उपलब्ध जब,
जिस तरह जितना मिले, अपना बनाओ दोस्तों |

देश की खातिर मरें हम, प्रण हमारे दिल में हो,
देश पर बलिदान हो , अमरत्व पाओ दोस्तों |

 

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हिन्दी कविता ः वसंत बहार

Shivendra, Sharma,शिवेन्द्र शर्मा, pallawa,पल्लव

शिवेन्द्र शर्मा

आओ प्यारे मनमोहक, सबको इंतजार तुम्हारा है।
रंग बिरंगी वसुधा पर, स्वागत रितुराज तुम्हारा है।।

प्रकृति को श्रृंगारित कर, नई उमंगें लाया है।
तभी तो सारी रितुओं का,राजा ये कहलाया है।।

सूरज लागे नया नया, चंदा भी मुस्काया है।
हर्षित हैं सब लोग यहाँ, रितुराज जो आया है।।

 

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पूनम पंडित की हिन्दी कविताएँ

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पूनम पंडित

कभी याद में, कभी इंतज़ार में ,
जिंदगी यूँ ही तमाम कटती रही।

मन मचलता रहा मै मनाती रही,
इंतजार की घड़ियाँ गिनती रही।
बस याद तुम्हें मै करती रही ,
जिंदगी यूं ही तमाम कटती रही।

 

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हिन्दी गजल

Dr. Kewal, Krishna, Pathak, डा. केवलकृष्ण पाठक, pallawa, पल्लव

डा. केवलकृष्ण पाठक

संयमित जीवन बिताना लक्ष्य है इंसान का
पर संयमहीन जीवन ही है बीतता आदमी

हो गया स्वाधीन फिर भी मानता पराधीन है
ऐसे वातावरण में खुश रहना चाहता आदमी

आज तो लगता है ऐसा आदमी निस्वार्थ है
धोखा दे के राज्य करना चाहता है आदमी

 

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कुमारी अर्चना की पाँच हिन्दी कविताएँ

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कुमारी अर्चना

१) “कौन पद्मावती”
इतिहास के पन्ने पर
जिसका केवल जिक्र भर ही है
कोई रोमानी कहानी सा लगता
आलाऊद्दीन ने पद्मावती के हुस्न के
जब चर्चे सुनके बाबरा सा हुआ
दर्पण में रूप के दर्शन कर
चितौड़ पर आक्रमण किया
रत्नसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ
पद्मवती ने सतित्व की रक्षा हेतु
जौहर किया और अन्य हरम़ की स्त्रीयों को–
अग्नीकुंड में काया को भष्माभूत करवाया
एक मुठ्ठी केवल राख आलाउद्दीन पाया–

 

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हिन्दी गजल

Dr., Raj, Kishor, Raaj Saksena Raaj, राज किशोर सक्सेना ‘राज’, pallawa, पल्लव

राज किशोर सक्सेना ‘राज’

सुर्ख होठों पे अजाने में , इबारत लिख दी |
अपने होठों से लबेजाँ पे, मुहब्बत लिख दी |

थमगया वक्त, बुत हुई कायनात पल के लिए,
उसने जब लौट मेरे होठ पे आफत लिख दी |

लब तो खामोश रहे , टीस पैबस्त हुई सीने में,
शोख नजरों से गमे-दिल पे , शरारत लिख दी |

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डाँ. राजकिशोर ‘राज’का हिन्दी मुक्तकहरूः

Dr., Raj, Kishor, Raaj Saksena Raaj,  राज किशोर सक्सेना ‘राज’, pallawa, पल्लव

राज किशोर सक्सेना ‘राज’

जो लक्ष्य बना अपने, अभियान चलाते हैं
पथ घोर परिश्रम से, आसान बनाते हैं ।
कैसी भी पड़े विपदा,साहस जो नहीं खोते,
मस्तक पे मुकुट उनके, भगवान सजाते हैं ।।

तल्खिए-हालातेमाज़ी पर,घुमाकर कुंदनज़रों को
उठा कर दास्तान-ए-ग़म, कुरेदा बंद खबरों को ।
तिजोरी से जिगर की उठाए लफ़्ज, कुछ चुन कर,
मिलाकर दर्देदिल उनमें,लिखा है चंद सतरों को ।।

 

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हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

साथ मेरे है माँ की दुआ देखिए
जो भी माँगा है मुझको मिला देखिए ।

हाथ सर पर बुज़ुर्गों का होगा अगर
ज़िन्दगी जीने का फिर मज़ा देखिए ।

अलविदा कैसे कह दूँ बता दो उन्हें
ज़िन्दगी का हैं वो आसरा देखिए ।

 

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हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

ज़िन्दगी यूँ सजाया करो
हर घड़ी मुस्कुराया करो ।

बिन तेरे दिल ये लगता नहीं
छोड़ कर यूँ न जाया करो ।

दिल का इतना बुरा भी नहीं
मेरे पहलू में आया करो ।

 

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बीर चौधरीको हिन्दी गजल

Vëéŕ, Chaudhary, Veer‎, वीर चाैधरी æवीर’, pallawa, पल्ल्व

वीर चाैधरी वीर’

तेरी दुनिया में तेरी ही हुकूमत है
कहीं मुहब्बत तो कहीं नफ़रत है

मेरी नज़र तो छू लेती है आसमान
नज़र से छोटी तो तेरी इमारत है

ऐसा लगा जब तुझको छूवा मैं ने
बदन में तेरी फूल सी नज़ाकत है

 

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सागर सूदका हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

कहीं नदियाँ, कहीं गुलशन, कहीं पर्बत ज़माने में
है हर इक रंग कुदरत का ख़ुदा के शामियाने में

ज़रा सोचो वो क्या सोचेगा अपने देश की ख़ातिर
हर इक पल जिसका कटता है यहाँ रोटी जुटाने में

ये कैसा दौर है इन्सानियत गुम है मेरे मालिक
मज़ा आता है लोगों को किसी का दिल दुखाने में

 

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कुमारी अर्चनाके हिन्दी तीन कविताएँ

Bittu, Kumari, Archana, कुमारी अर्चना, pallawa, पल्लव

कुमरी अर्चना

१) “घर घर शौचालय हो जाये तो”
जॉनी ने कहा अपने मालिक से
मैं टहलने के लिए जा रहा हूँ
इधर उधर चलते चलते
सेर भी हो जाएगी
मैं हलका भी हो जाऊँगा!

तुम भी तो पहले मेरे जैसे
घर से कोसों दूर दूर
जाया करते थे टट्टी करने के लिए !

सेर कर अपने स्वास्थ के साथ
दोस्तों से गप्पे मारा कर
मन का बौझ भी उतारते थे
पर अब तुम दो कमरे के एक कोने में–

 

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“नंगी ही हूँ मैं”

Bittu, Kumari, Archana, कुमारी अर्चना, pallawa, पल्लव

कुमरी अर्चना

नंगी ही हूँ मैं
कम कपड़ो में
बिन कपड़ो के
तो क्या हुआ
जब पुरूष हो सकते है
तो स्त्री क्यों नहीं?
वैसे तो हर कोई नंगा आता
और नंगा ही जाता है
बस नाम का कुछ बित्तों का
सफेद कफ़न जाता है
वो भी शरीर के साथ
आत्मा तो नंगी की नंगी रह जाती!

 

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“कागज ही तो मैं”

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विट्टु अर्चना

सफेद सी
रंगहीन सी
उजास सी
उपर से नीचे तक एक सी!
कागज सा है मेरा जीवन
कोरा
कुछ प्यार की बूँदे को
छिड़का था जब तुमने
पर भींग ना सका मेरा मन
परती जमीन सा फिर हो गया
ना कोई बीज जमीन की गर्भ में गया
ना कोई पौधा ही उगा सका
बस उजड़ का उजड़ रह गया!

 

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बहरबद्ध हन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

हमने तुमसे प्यार किया था लेकिन तुमको याद नहीं
सुख में दुख में साथ दिया था लेकिन तुमको याद नहीं

तुमको देखा तुमको चाहा तुम को पूजा जीवन भर
तुमको ही रब मान लिया था लेकिन तुमको याद नहीं

धन दौलत की कहते हो तुम ये तो छोटी बातें हैं
हमने तन मन वार दिया था लेकिन तुमको याद नहीं

 

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सागर सूदका दो हन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

हन्दी गजल– १,
यूँ कहने को तो पहुँचा है ये इन्सां आस्मानों में
मगर इंसानियत फिर भी यहाँ बिकती दुकानों में

नहीं किरदार अब बाकी यहाँ के हुक्मरानों में
ज़मीं तो खा चुके नज़रें गड़ी हैं आस्मानों में

हमारे सर पे होगा शामियाना गर बज़ुर्गों का
रहेगी हर ख़ुशी फिर देखना अपने मकानों में

 

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हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

मुहब्बत की रिवायत को यूँ हम दोनों निभायेंगे
कभी तुम याद आ जाना कभी हम याद आयेंगे

खफ़ा होने नहीं देंगे कभी इक दूसरे को हम
कभी तुम मुस्कुरा देना कभी हम मुस्कुरायेंगे

कोई कुछ भी कहे कहता रहे कहने दो आदत है
हमारा दिल जो चाहेगा वो हम करते ही जायेंगे

 

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बहरबद्ध हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

यूँ कहने को तो पहुँचा है ये इन्सां आस्मानों में
मगर इंसानियत फिर भी यहाँ बिकती दुकानों में

नहीं किरदार अब बाकी यहाँ के हुक्मरानों में
ज़मीं तो खा चुके नज़रें गड़ी हैं आस्मानों में

हमारे सर पे होगा शामियाना गर बज़ुर्गों का
रहेगी हर ख़ुशी फिर देखना अपने मकानों में

 

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