सागर सूदका हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

कहीं नदियाँ, कहीं गुलशन, कहीं पर्बत ज़माने में
है हर इक रंग कुदरत का ख़ुदा के शामियाने में

ज़रा सोचो वो क्या सोचेगा अपने देश की ख़ातिर
हर इक पल जिसका कटता है यहाँ रोटी जुटाने में

ये कैसा दौर है इन्सानियत गुम है मेरे मालिक
मज़ा आता है लोगों को किसी का दिल दुखाने में

 

Continue reading


कुमारी अर्चनाके हिन्दी तीन कविताएँ

Bittu, Kumari, Archana, कुमारी अर्चना, pallawa, पल्लव

कुमरी अर्चना

१) “घर घर शौचालय हो जाये तो”
जॉनी ने कहा अपने मालिक से
मैं टहलने के लिए जा रहा हूँ
इधर उधर चलते चलते
सेर भी हो जाएगी
मैं हलका भी हो जाऊँगा!

तुम भी तो पहले मेरे जैसे
घर से कोसों दूर दूर
जाया करते थे टट्टी करने के लिए !

सेर कर अपने स्वास्थ के साथ
दोस्तों से गप्पे मारा कर
मन का बौझ भी उतारते थे
पर अब तुम दो कमरे के एक कोने में–

 

Continue reading


“नंगी ही हूँ मैं”

Bittu, Kumari, Archana, कुमारी अर्चना, pallawa, पल्लव

कुमरी अर्चना

नंगी ही हूँ मैं
कम कपड़ो में
बिन कपड़ो के
तो क्या हुआ
जब पुरूष हो सकते है
तो स्त्री क्यों नहीं?
वैसे तो हर कोई नंगा आता
और नंगा ही जाता है
बस नाम का कुछ बित्तों का
सफेद कफ़न जाता है
वो भी शरीर के साथ
आत्मा तो नंगी की नंगी रह जाती!

 

Continue reading


“कागज ही तो मैं”

Bittu, Kumari, Archana, विट्टु अर्चना, pallawa, पल्लव

विट्टु अर्चना

सफेद सी
रंगहीन सी
उजास सी
उपर से नीचे तक एक सी!
कागज सा है मेरा जीवन
कोरा
कुछ प्यार की बूँदे को
छिड़का था जब तुमने
पर भींग ना सका मेरा मन
परती जमीन सा फिर हो गया
ना कोई बीज जमीन की गर्भ में गया
ना कोई पौधा ही उगा सका
बस उजड़ का उजड़ रह गया!

 

Continue reading


बहरबद्ध हन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

हमने तुमसे प्यार किया था लेकिन तुमको याद नहीं
सुख में दुख में साथ दिया था लेकिन तुमको याद नहीं

तुमको देखा तुमको चाहा तुम को पूजा जीवन भर
तुमको ही रब मान लिया था लेकिन तुमको याद नहीं

धन दौलत की कहते हो तुम ये तो छोटी बातें हैं
हमने तन मन वार दिया था लेकिन तुमको याद नहीं

 

Continue reading


सागर सूदका दो हन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

हन्दी गजल– १,
यूँ कहने को तो पहुँचा है ये इन्सां आस्मानों में
मगर इंसानियत फिर भी यहाँ बिकती दुकानों में

नहीं किरदार अब बाकी यहाँ के हुक्मरानों में
ज़मीं तो खा चुके नज़रें गड़ी हैं आस्मानों में

हमारे सर पे होगा शामियाना गर बज़ुर्गों का
रहेगी हर ख़ुशी फिर देखना अपने मकानों में

 

Continue reading


हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

मुहब्बत की रिवायत को यूँ हम दोनों निभायेंगे
कभी तुम याद आ जाना कभी हम याद आयेंगे

खफ़ा होने नहीं देंगे कभी इक दूसरे को हम
कभी तुम मुस्कुरा देना कभी हम मुस्कुरायेंगे

कोई कुछ भी कहे कहता रहे कहने दो आदत है
हमारा दिल जो चाहेगा वो हम करते ही जायेंगे

 

Continue reading


बहरबद्ध हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

यूँ कहने को तो पहुँचा है ये इन्सां आस्मानों में
मगर इंसानियत फिर भी यहाँ बिकती दुकानों में

नहीं किरदार अब बाकी यहाँ के हुक्मरानों में
ज़मीं तो खा चुके नज़रें गड़ी हैं आस्मानों में

हमारे सर पे होगा शामियाना गर बज़ुर्गों का
रहेगी हर ख़ुशी फिर देखना अपने मकानों में

 

Continue reading


शंकर जी सिंह के कुछ मेरी काव्य संकलन कि टुकुडें

Sankar, Ji, Singh, शंकर जी सिँह, pallawa, पल्लव

शंकर जी सिँह

(“स्मृतियों के दंश” से)
प्रेम आँच से सज जाती तू
स्वाभिमान से तन जाती तू
तू लड़ती मैं तुम्हें मनाता
काश ! प्रेमिका बन जाती तू।
*
सिसकी – संग पीड़ा की कैसी कराह हैं
गाँव – गाँव बाढ़ में हो रहे तबाह हैं
मुखिया के घर पर मुजरे का जश्न है
दरबार हैं, सभासद हैं , और वाह ! वाह ! हैं
नम्बर दो के पैसे से कोठी भी धनी आज
बूढा भी कर रहा गरीब कन्या से निकाह हैं
ऐसे में क्यों नही किसी जाति का झुका सिर
सो गए हैं मंदिर क्या, गुरुद्वारा , ईदगाह हैं?
कितने की गई जान कितने ही गाँव बहे
गुस्साई हुई नदी का यह कैसा प्रवाह हैं
सिसकी संग——————- कैसी कराह हैं
गुस्साई हुई ————————-कैसा प्रवाह हैं
*

Continue reading


मनहरण

Ankur, Sulka,, अंकुर शुक्ल, pallawa, पल्लव

अंकुर शुक्ल

माँ के दिल जैसा दिल,दुनिया में कोई नहीं
माँ का दिल प्रेम त्याग, ममता की खान है

पूजता हूँ माँ को सदा,तंग नहीं करता हूँ
जननी है वो तो मेरी,माँ तो भगवान है

रूप भी मिला उसी से,रंग भी मिला उसी से
उससे मेरा वजूद ,मेरी पहचान है

 

Continue reading


हिन्दी गजल

Luxmi, Srivastava,लक्ष्मी श्रीवास्तवा 'कादम्बिनी'. pallawa, पल्लव

लक्ष्मी श्रीवास्तवा ‘कादम्बिनी’

कभी दूरियाँ कभी मजबूरियाँ लिखो तुम
लगाओ दिल पर मरहम आरियां लिखो तुम

बात निकलीं हैं तो जिगर में उतर जायें
ऐसी बातें कुछ दुधारियाँ लिखो तुम

इश्क होता है तो क्यूं चैन खो जाता है
इश्क की सारी बिमारियाँ लिखो तुम

 

Continue reading


डॉ.अजय श्रीवास्तव ‘अश्क’का हिन्दी मुक्तकः

dr. Ajay, Srivastava, Ashk, डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क , pallawa, पल्लव

डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क

तुम्हारा दो मुहा चेहरा हमें भाता नहीं सच है।
इसी से मैं तुम्हारे घर कभी आता नहीं सच है।।
तुम्हारी असलियत सब जान जाएंगे इसी कारण।
तुम्हारे जुल्म के किस्से मैं बतलाता नहीं सच है।।

गीदड़ों छुप के वार करना अगर जारी है।
तो तीन रंग का ये हौसला भी भारी है।।
लहू को तेल और खुद को बनाकर बाती।
हवा में दीप जलाने कि जिद हमारी है।।

 

Continue reading


हिन्दी गजल

Komal, Gupta, कोमल गुप्ता, कोमल , pallawa, पल्लव

कोमल गुप्ता

याद तेरी ही आती रही रात भर,
गीत तेरे ही गाती रही रात भर।

बस तेरा नाम आता ही आता रहा,
सोचकर कुछ लजाती रही रात भर।

कोई सन्देश आया नहीं आज जब
कल के सपने सजाती रही रात भर।।

 

Continue reading


कोमल गुप्ता की हिन्दी ग़ज़ल

Komal, Gupta, कोमल गुप्ता, कोमल , pallawa, पल्लव

कोमल गुप्ता

ख़ुदा तुमसे किये वादे मुझे बेशक़ निभाना है
तुम्हारे पास ही मुझको मकाँ अपना बनाना है

बताऊ क्यूँ भला तुमको , यहाँ क्या करने आई थी
यहाँ जो कऱ ने आई थी मुझे वो कर के जाना है

सजाये थे बहुत सपने जो बचपन में कभी मैंने
मुझे उनको लगाकर पर जरा सा अब उड़ाना है

 

Continue reading


राज सक्सेना ‘राज’का एक दर्जन हिन्दीमुक्तकहरूः

Dr., Raj, Kishor, Saksena, Saxena, Raj,राज किशोर सक्सेना ‘राज’, pallawa, पल्लव

राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

बेचैन हर जगह थे, हम इस जहां में आकर
सोए नहीं थे कब से,महलों में अपने जाकर ।
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए-कब्र में आ,
कितना सुकूं मिला है, छोटे मकां में आकर ।।

बात जारी है अभी, इसकी र वानी रखिये
रात बाकी है सभी, इसको सुहानी रखिये ।
मोड़ पर क्यूँ भला, छोड़ी है कहानी लाकर,
खत्म ऐसे ना कभी , कोई कहानी करिये ।।

 

Continue reading


डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क का हिन्दी गीत

dr.,Ajay, Srivastava, Ashk, basti, अजय श्रीवास्तव "अश्क", pallawa, पल्लव

डॉ. अश्क अजय श्रीवास्तव

ख्वाब आँखों से हरगिज मिटाना नही।
तुम मेरे प्यार को आजमाना नहीं।

मन है चंचल बहुत ये तो भटकेगा ही।
चांद के झुरमुटों में तो अटकेगा ही।।
रूप दर्पन में अपना निरखना नहीं।
और निरखना कभी तो परखना नहीं।।
गर परख भी लिए तो बताना नहीं…
तुम मेरे प्यार को आजमाना नहीं।।

 

Continue reading


हिन्दी गजल

Kawayitri, Samixa, sinha, Jadoin, कवयित्री समीक्षा सिंह जादौन, pallawa ,पल्लव

समीक्षा सिंह जादौन

कभी भी ना सताने की कसम खाते रहे सारे
हमें अपना बनाने की कसम खाते रहे सारे ।

हमारा दिल नहीं टूटा कभी मायूस होकर जब
हमें फिर आज़माने की कसम खाते रहे सारे ।

छुपाया है हमीं से सब हमारे रहनुमाओं नें
हमीं को सच बताने की कसम खाते रहे सारे ।

Continue reading


भाल चन्द्र शीश गंग

Ratna, Mani, Tiwari, Batsha, रत्नमणि तिवारी " वर्षा", PALLAWA , पल्लव

रत्नमणि तिवारी ” वर्षा”

भाल चन्द्र शीश गंग ,
भंग रंग अंग-अंग
होली हुडदंग ये तो
शिव को भी भाते हैं

डमरू बजाते और
कर में त्रिशूल धार
लपेटे भुजंग संग
ब्रज चले आते हैं

कृष्णा संग नाच रही
गोपियों को देख कर
नाचने को संग-संग
ये भी ललचाते हैं

Continue reading


‘जन्म से पहले मुझे न मारो’

Surekha,, Sharma, सुरेखा शर्मा, pallawa, पल्लव

सुरेखा शर्मा

जन्म से पहले मुझे न मारो’
देख रही हूं मिटता जीवन ,
छाया घोर अन्धेरा।

हरपल जकड़े पथ में मुझको,
शंकाओं का घेरा।
मेरे जीवन की डोरी को,
माता यूं मत तोड़ो।

मैं भी जन्मूं इस धरती पर,
मुझे अपनों से जोड़ो ।
क्यों इतनी निष्ठूर हुई माता,
क्या है मेरी गलती।
हाय विधाता कैसी दुनिया
नारी को नारी छलती।

 

Continue reading


माँ चिन्तपूर्णी चिन्ता में

Surekha,, Sharma, सुरेखा शर्मा, pallawa, पल्लव

सुरेखा शर्मा

व्यंग्य–
नारायण •••नारायण ••”माते, यह मैं क्या देख रहा हूं ••!जगत की चिंता दूर करने वाली माँ चिन्तपूर्णी आज स्वयं चिन्तित हैं •••क्या बात है माँ ,आप किस दुविधा में हैं ?” माँ दुर्गा कुछ विचार करते हुए बोली, ‘तुम नहीं समझोगे नारद ।’
“माते,जब तक आप कुछ बताएंगी नहीं तो मैं कैसे समझूंगा भला नारायण •••नारायण। ” तुम जानते हो नारद, आजकल भूलोक वासी पूजा-पाठ बहुत करने लगे हैं ।मेरे भक्तों की संख्या दिन- पर -दिन बढ़ती जा रही है ।तुम देखना आने वाले इन नौ दिनों में तो चारों ओर मेरा ही गुणगान किया जाएगा ।भूखे- प्यासे रहकर उपवास कर नवरात्र अनुष्ठान संपन्न करेंगे । उपवास तो कहने मात्र के लिए होते हैं, सारा दिन फलाहार के नाम पर इतना खाते हैं कि पूछो मत।”

 

Continue reading