हिन्दी गजल

Dr., Raj, Kishor, Raaj Saksena Raaj, राज किशोर सक्सेना ‘राज’, pallawa, पल्लव

राज किशोर सक्सेना ‘राज’

सुर्ख होठों पे अजाने में , इबारत लिख दी |
अपने होठों से लबेजाँ पे, मुहब्बत लिख दी |

थमगया वक्त, बुत हुई कायनात पल के लिए,
उसने जब लौट मेरे होठ पे आफत लिख दी |

लब तो खामोश रहे , टीस पैबस्त हुई सीने में,
शोख नजरों से गमे-दिल पे , शरारत लिख दी |

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डाँ. राजकिशोर ‘राज’का हिन्दी मुक्तकहरूः

Dr., Raj, Kishor, Raaj Saksena Raaj,  राज किशोर सक्सेना ‘राज’, pallawa, पल्लव

राज किशोर सक्सेना ‘राज’

जो लक्ष्य बना अपने, अभियान चलाते हैं
पथ घोर परिश्रम से, आसान बनाते हैं ।
कैसी भी पड़े विपदा,साहस जो नहीं खोते,
मस्तक पे मुकुट उनके, भगवान सजाते हैं ।।

तल्खिए-हालातेमाज़ी पर,घुमाकर कुंदनज़रों को
उठा कर दास्तान-ए-ग़म, कुरेदा बंद खबरों को ।
तिजोरी से जिगर की उठाए लफ़्ज, कुछ चुन कर,
मिलाकर दर्देदिल उनमें,लिखा है चंद सतरों को ।।

 

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हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

साथ मेरे है माँ की दुआ देखिए
जो भी माँगा है मुझको मिला देखिए ।

हाथ सर पर बुज़ुर्गों का होगा अगर
ज़िन्दगी जीने का फिर मज़ा देखिए ।

अलविदा कैसे कह दूँ बता दो उन्हें
ज़िन्दगी का हैं वो आसरा देखिए ।

 

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हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

ज़िन्दगी यूँ सजाया करो
हर घड़ी मुस्कुराया करो ।

बिन तेरे दिल ये लगता नहीं
छोड़ कर यूँ न जाया करो ।

दिल का इतना बुरा भी नहीं
मेरे पहलू में आया करो ।

 

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बीर चौधरीको हिन्दी गजल

Vëéŕ, Chaudhary, Veer‎, वीर चाैधरी æवीर’, pallawa, पल्ल्व

वीर चाैधरी वीर’

तेरी दुनिया में तेरी ही हुकूमत है
कहीं मुहब्बत तो कहीं नफ़रत है

मेरी नज़र तो छू लेती है आसमान
नज़र से छोटी तो तेरी इमारत है

ऐसा लगा जब तुझको छूवा मैं ने
बदन में तेरी फूल सी नज़ाकत है

 

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सागर सूदका हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

कहीं नदियाँ, कहीं गुलशन, कहीं पर्बत ज़माने में
है हर इक रंग कुदरत का ख़ुदा के शामियाने में

ज़रा सोचो वो क्या सोचेगा अपने देश की ख़ातिर
हर इक पल जिसका कटता है यहाँ रोटी जुटाने में

ये कैसा दौर है इन्सानियत गुम है मेरे मालिक
मज़ा आता है लोगों को किसी का दिल दुखाने में

 

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कुमारी अर्चनाके हिन्दी तीन कविताएँ

Bittu, Kumari, Archana, कुमारी अर्चना, pallawa, पल्लव

कुमरी अर्चना

१) “घर घर शौचालय हो जाये तो”
जॉनी ने कहा अपने मालिक से
मैं टहलने के लिए जा रहा हूँ
इधर उधर चलते चलते
सेर भी हो जाएगी
मैं हलका भी हो जाऊँगा!

तुम भी तो पहले मेरे जैसे
घर से कोसों दूर दूर
जाया करते थे टट्टी करने के लिए !

सेर कर अपने स्वास्थ के साथ
दोस्तों से गप्पे मारा कर
मन का बौझ भी उतारते थे
पर अब तुम दो कमरे के एक कोने में–

 

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“नंगी ही हूँ मैं”

Bittu, Kumari, Archana, कुमारी अर्चना, pallawa, पल्लव

कुमरी अर्चना

नंगी ही हूँ मैं
कम कपड़ो में
बिन कपड़ो के
तो क्या हुआ
जब पुरूष हो सकते है
तो स्त्री क्यों नहीं?
वैसे तो हर कोई नंगा आता
और नंगा ही जाता है
बस नाम का कुछ बित्तों का
सफेद कफ़न जाता है
वो भी शरीर के साथ
आत्मा तो नंगी की नंगी रह जाती!

 

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“कागज ही तो मैं”

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विट्टु अर्चना

सफेद सी
रंगहीन सी
उजास सी
उपर से नीचे तक एक सी!
कागज सा है मेरा जीवन
कोरा
कुछ प्यार की बूँदे को
छिड़का था जब तुमने
पर भींग ना सका मेरा मन
परती जमीन सा फिर हो गया
ना कोई बीज जमीन की गर्भ में गया
ना कोई पौधा ही उगा सका
बस उजड़ का उजड़ रह गया!

 

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बहरबद्ध हन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

हमने तुमसे प्यार किया था लेकिन तुमको याद नहीं
सुख में दुख में साथ दिया था लेकिन तुमको याद नहीं

तुमको देखा तुमको चाहा तुम को पूजा जीवन भर
तुमको ही रब मान लिया था लेकिन तुमको याद नहीं

धन दौलत की कहते हो तुम ये तो छोटी बातें हैं
हमने तन मन वार दिया था लेकिन तुमको याद नहीं

 

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सागर सूदका दो हन्दी गजल

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सागर सूद

हन्दी गजल– १,
यूँ कहने को तो पहुँचा है ये इन्सां आस्मानों में
मगर इंसानियत फिर भी यहाँ बिकती दुकानों में

नहीं किरदार अब बाकी यहाँ के हुक्मरानों में
ज़मीं तो खा चुके नज़रें गड़ी हैं आस्मानों में

हमारे सर पे होगा शामियाना गर बज़ुर्गों का
रहेगी हर ख़ुशी फिर देखना अपने मकानों में

 

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हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

मुहब्बत की रिवायत को यूँ हम दोनों निभायेंगे
कभी तुम याद आ जाना कभी हम याद आयेंगे

खफ़ा होने नहीं देंगे कभी इक दूसरे को हम
कभी तुम मुस्कुरा देना कभी हम मुस्कुरायेंगे

कोई कुछ भी कहे कहता रहे कहने दो आदत है
हमारा दिल जो चाहेगा वो हम करते ही जायेंगे

 

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बहरबद्ध हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

यूँ कहने को तो पहुँचा है ये इन्सां आस्मानों में
मगर इंसानियत फिर भी यहाँ बिकती दुकानों में

नहीं किरदार अब बाकी यहाँ के हुक्मरानों में
ज़मीं तो खा चुके नज़रें गड़ी हैं आस्मानों में

हमारे सर पे होगा शामियाना गर बज़ुर्गों का
रहेगी हर ख़ुशी फिर देखना अपने मकानों में

 

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शंकर जी सिंह के कुछ मेरी काव्य संकलन कि टुकुडें

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शंकर जी सिँह

(“स्मृतियों के दंश” से)
प्रेम आँच से सज जाती तू
स्वाभिमान से तन जाती तू
तू लड़ती मैं तुम्हें मनाता
काश ! प्रेमिका बन जाती तू।
*
सिसकी – संग पीड़ा की कैसी कराह हैं
गाँव – गाँव बाढ़ में हो रहे तबाह हैं
मुखिया के घर पर मुजरे का जश्न है
दरबार हैं, सभासद हैं , और वाह ! वाह ! हैं
नम्बर दो के पैसे से कोठी भी धनी आज
बूढा भी कर रहा गरीब कन्या से निकाह हैं
ऐसे में क्यों नही किसी जाति का झुका सिर
सो गए हैं मंदिर क्या, गुरुद्वारा , ईदगाह हैं?
कितने की गई जान कितने ही गाँव बहे
गुस्साई हुई नदी का यह कैसा प्रवाह हैं
सिसकी संग——————- कैसी कराह हैं
गुस्साई हुई ————————-कैसा प्रवाह हैं
*

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मनहरण

Ankur, Sulka,, अंकुर शुक्ल, pallawa, पल्लव

अंकुर शुक्ल

माँ के दिल जैसा दिल,दुनिया में कोई नहीं
माँ का दिल प्रेम त्याग, ममता की खान है

पूजता हूँ माँ को सदा,तंग नहीं करता हूँ
जननी है वो तो मेरी,माँ तो भगवान है

रूप भी मिला उसी से,रंग भी मिला उसी से
उससे मेरा वजूद ,मेरी पहचान है

 

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हिन्दी गजल

Luxmi, Srivastava,लक्ष्मी श्रीवास्तवा 'कादम्बिनी'. pallawa, पल्लव

लक्ष्मी श्रीवास्तवा ‘कादम्बिनी’

कभी दूरियाँ कभी मजबूरियाँ लिखो तुम
लगाओ दिल पर मरहम आरियां लिखो तुम

बात निकलीं हैं तो जिगर में उतर जायें
ऐसी बातें कुछ दुधारियाँ लिखो तुम

इश्क होता है तो क्यूं चैन खो जाता है
इश्क की सारी बिमारियाँ लिखो तुम

 

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डॉ.अजय श्रीवास्तव ‘अश्क’का हिन्दी मुक्तकः

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डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क

तुम्हारा दो मुहा चेहरा हमें भाता नहीं सच है।
इसी से मैं तुम्हारे घर कभी आता नहीं सच है।।
तुम्हारी असलियत सब जान जाएंगे इसी कारण।
तुम्हारे जुल्म के किस्से मैं बतलाता नहीं सच है।।

गीदड़ों छुप के वार करना अगर जारी है।
तो तीन रंग का ये हौसला भी भारी है।।
लहू को तेल और खुद को बनाकर बाती।
हवा में दीप जलाने कि जिद हमारी है।।

 

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हिन्दी गजल

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कोमल गुप्ता

याद तेरी ही आती रही रात भर,
गीत तेरे ही गाती रही रात भर।

बस तेरा नाम आता ही आता रहा,
सोचकर कुछ लजाती रही रात भर।

कोई सन्देश आया नहीं आज जब
कल के सपने सजाती रही रात भर।।

 

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कोमल गुप्ता की हिन्दी ग़ज़ल

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कोमल गुप्ता

ख़ुदा तुमसे किये वादे मुझे बेशक़ निभाना है
तुम्हारे पास ही मुझको मकाँ अपना बनाना है

बताऊ क्यूँ भला तुमको , यहाँ क्या करने आई थी
यहाँ जो कऱ ने आई थी मुझे वो कर के जाना है

सजाये थे बहुत सपने जो बचपन में कभी मैंने
मुझे उनको लगाकर पर जरा सा अब उड़ाना है

 

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राज सक्सेना ‘राज’का एक दर्जन हिन्दीमुक्तकहरूः

Dr., Raj, Kishor, Saksena, Saxena, Raj,राज किशोर सक्सेना ‘राज’, pallawa, पल्लव

राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

बेचैन हर जगह थे, हम इस जहां में आकर
सोए नहीं थे कब से,महलों में अपने जाकर ।
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए-कब्र में आ,
कितना सुकूं मिला है, छोटे मकां में आकर ।।

बात जारी है अभी, इसकी र वानी रखिये
रात बाकी है सभी, इसको सुहानी रखिये ।
मोड़ पर क्यूँ भला, छोड़ी है कहानी लाकर,
खत्म ऐसे ना कभी , कोई कहानी करिये ।।

 

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