ग़ज़ल

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गङ्गा श्री पन्थी

आओ किसी का यूँही इंतजार करते हैं..!
चाय बनाकर फिर कोई बात करते हैं..!!

उम्र पचास के पार हो गई हमारी..!
बुढ़ापे का इस्तक़बाल करते है..!!

कौन आएगा अब हमको देखने यहां..!
एक दूसरे की देखभाल करते है..!!

 

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पूनम पंडित की हिन्दी कवितायें

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पूनम पंडित

पीली चूनर ओढ़ कर, मां धरा रही मुस्काय ।
पुलकित सबका मन भया, खुशी ना वरनी जाय ।

खुशी ना वरनी जाय, सभी मिल मोद मनायें ।
मां के आंचल से लिपट, झूमे और गायें ।

देख मात का रूप, सुधि भूला हर जन मन ।
बच्चों की किलकारियों से, गुंजित हुआ उपवन ।

 

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ओ पुरुष मेरे मित्रोः !!

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गङ्गा श्री पन्थी

गङ्गा श्री पन्थी की म्यासेन्जर से प्राप्त रचना !!!
जो कभी चाहिए हो किसी स्त्री की देह तो बिना किसी लाग-लपेट के सीधे जाकर उससे विनम्रता से याचना कर लेना । याचना स्वीकार हो जाये तो अनुग्रह मानना, न स्वीकार हो तो उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए लौट जाना, जहां से आये थे। लेकिन जो कभी चाहिए स्त्री की देह तो प्रेम के रास्ते पर मत चलकर जाना, अपनी कामना को प्रेम के आवरण में लपेटकर मत प्रस्तुत करना। ऐसा करके देह तो अवश्य ही पा लोगे लेकिन साथ में देह के भीतर तुम्हारे प्रेम में डूबी उस स्त्री की आत्मा भी आएगी जिसकी तुम्हें ज़रूरत नही होगी और उस ठुकराई हुई निर्दोष आत्मा के गुनहगार तुम ता-उम्र रहोगे ।

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां का हिन्दी में छे कविताएँ

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१) कटी
अंगुलियां
बरसों पहले सुनी थी
वो कहानी
जिसे आज साक्षात
देख भी लिया
एक बालक
एक कसाई के यहाँ
नोकरी करता था
काम के
बदले में मिल जाती थी
दो वक़्त की
रोटी–

 

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डॉ मिनाक्षी कहकशां की कुछ हिन्दी कविताएँ

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१) कल रात
उसे बड़े दिनों बाद
मेरी याद हो आयी
और आ गया
अपने प्यारे साज़,
छैनी और हथौड़ा लेकर
और शुरू हो गया
मेरे सुफ्त भावों पर
चोट कर कर
छील डाला मेरा जिस्म
सँवारने की कोशिश में–

 

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डॉ मिनाक्षी कहकशां की कुछ पङ्तियां की चार टुक्रे हिन्दीमें

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१)
सांपो की बस्ती में चलना सम्भल कर
हर इक शख्श यहाँ डसता मचल कर

चूमकर कपोल करता मदहोश तुमको
मारे डंक फिर तेरी जिव्हा कुचल कर

किसी से ना जुर्म उसका तू कह पाए
वास्ते वो जुवां तेरी रखता पकड़ कर

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां का हिन्दी में पाँच कविताएँ

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१) आज मैं
सो रही हूँ
मुझे
जगाना मत
संगतराश
तू बरसों से
जगा रहा है
मुझे
ठोंक ठोंक कर
ज़रा सा भी
नहीं सोचा तूने
की चोट लगती है –

 

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हिन्दी कविताः मुझे याद हैं

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विजय पंडित

वो लम्हे
आते जाते हर सफर में
होती थी जब
किताब सबके हाथ में
सच्चे मित्र जैसे
हर पल
साथ निभाती पुस्तके
राह दिखाती..
पुस्तको में
वो खतों का
आदान प्रदान.. –

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां का हिन्दी कविताएँ

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

आज
फिर वो फरिश्ता
चुपचाप बैठ गया
मेरे सामने,
निहारता रहा मुझे
मैं सो रही थी
पर कैसे सोती
जैसे चांदनी रात में
सूरज चमक उठा हो,
ऐसे ही उसकी
मुहब्बत भरी किरणें
मेरी पलकों पे पड़ी
और मैं चुँधिया कर
जाग गई,–

 

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पूनम पंडित की कुछ पङ्तियाँ

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पूनम पंडित

अचानक हो रहा है कुछ नया सा एहसास।
मचल रहे हैं अरमान, जग रहे हैं सुप्त प्राण।

मन करता है, मैं भी मनाऊँ त्यौहार।
बाँधू राखी, भाई की कलाई पर।
लगाऊँ मंगल टीका, उतारूं नज़र।
तीज मनाऊँ, जाऊँ बाबुल के घर।

लौट जाऊँ , बचपन के आँगन में।
पेड़ों पर झूले डालूँ, झूलूँ सावन में।
विचरूँ उन्मुक्त बाबुल के कानन में।
बच्चों संग अलमस्त खेलूँ आँगन में।

 

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हिन्दीमा प्रेरक प्रसंग

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विजय पंडित

नगर की प्रसिद्ध वैश्या की गली से एक योगी जा रहा था कंधे पर झोली डाले। योगी को देखते ही एक द्वार खुला। सामने की महिला ने योगी को देखा। ध्यान की गरिमा से आपूर, अंतर मौन की रश्मियों से भरपूर। योगी को देखकर महिला ने निवेदन किया गृह में पधारने के लिए। उसके आमन्त्रण में वासना का स्वर था।योगी ने उत्तर दिया,” देखती नहीं झोली में दवाएं पड़ी हैं, गरीबों में बांटनी हैं उन्हें रोगों से मुक्त करना है। हमारे और तुम्हारे कार्य में अंतर है तुम रोग बढ़ाती हो, हम रोग मिटाते हैं। तुम शरीर और वासना की भाषा बोलती हो, हम सत्य और बोध की।”

 

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पूनम पण्डित की हिन्दी दो टुक्रे

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पूनम पंडित

एक
तुम ही से माथे का कुमकुम ,
तुम ही से हाथों के कंगन।
मंगलसूत्र तुम ही से सजता ,
तुम ही से पायल की छनछन।

तुम ही से हैं सुबहो शाम ,
तुम ही से महके घर गाम।
रूप -सिंगार तुम ही से सजता ,
तुम ही से महका मन उपवन।

 

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पुनम पण्डित की सुन्दर हिन्दी मुक्तकें

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पूनम पंडित

मन में यही प्रतिज्ञा लेकर सबको आगे आना है।
सबको मिलकर हिंदी भाषा को महकाना है।
आँच आने पाये ना माता के गौरव पर कभी ,
अपनी मातृ भाषा को और समृद्ध बनाना है।

संस्कृत की बेटी है, उर्दू की प्यारी बहना है।
प्यारी हिंदी भाषा सब भाषाओँ का गहना है।
आओ सब मिलकर, प्रण करो साथियो ,
हिंदी भाषा को जन – जन की भाषा बनाना है।

 

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डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क का हिन्दी गज़ल

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डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क

कितना करता है असर तूफ़ान देखा जाएगा
फिर यहाँ गुलशन मेरा वीरान देखा जाएगा ।

एक अदना फूल हूं बस इतनी है मेरी विसात
हौसले को तोड़कर गुलदान देखा जाएगा ।

राह में शोले हैं जख़्मी पांव खूं से तरबतर
और फिर आगे सफ़र आसान देखा जाएगा ।

 

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श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना के छे कविताएँ

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कुमारी अर्चना

1) भोजपुरी कविता
लाल लाल टमाटर देखs के
सबके जीव ललचाय हो गोरी
सबके जीव ललचाय

लाल टमाटर खाई के गोरी
लाल गाल दिखलाय हो गोरी
लाल गाल दिखलाय

पड़ल मँहगाई के अइसन मार
टमाटर गईल सौ रूपिया के पार
बिन गर्मी के पारा चढ़ल
सैतालिस के पार उ बढ़ल

 

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श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना का दो कविता

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श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना

१) “अलबेली चली अलबेला ढूढ़ने”
अलबेली की जब शादी की
उम्र हो आई तो / उसको अलबेला ढूढ़ने की सूझी
सोची चुटकी बजा कर / इस पहली को सुलझा दूँगी !
लव और अरैंज के विवाद में उलझी
पर किसको पता था वो
कई वर्षों के वनवास में फंसी !

कभी कॉलेज तो
तो कभी लाइब्रेरी तो
कभी केन्टीन तो
तो कभी पार्क में
कभी कोचिंग में
तो कभी पार्टियों में
फिर ना मिला वे छबिला !

 

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राज सक्सेनाका एकदर्जन हिन्दी मुक्तकः

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’

बेचैन हर जगह थे, हम इस जहां में आकर ।
सोए नहीं थे कब से, महलों में चैन पाकर ।
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए-कब्र में आ,
कितना सुकूं मिला है, छोटे मकां में आकर ।
आगोशे कब्र = कब्र की गोद

सौ बार ये लगता है किस्मत, दीवार खड़ी कर देती है ।
आसान लग रही राहों में, अवरोध अधिक भर देती है ।
पर सच यह भी दृढनिश्चय ले, साहस से आगे बढो अगर,
होचुकी बाम ये किस्मत ही, पथ को समतल कर देती है ।

 

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“मावस का अंधेरा” मावस की अंधेर में

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कवयित्री कुमारी अर्चना

चकोर के आने इंतजार में
चाँद रात के द्वार पर खड़ा
कही निगल न लें अंधेरा! ये सब कुछ निगल लेता
पर कुछ पदचिन्ह नहीं छोड़ता
केवल अंधेरे के! किसी की खुशी को
किसी के अरमानों को
किसी के प्यार को
किसी के जहाँ को.. .. पहले चाँद को
धीरे धीरे खाता जाता
फिर चाँदनी को कैद़ करता
फिर सारे तारों की चमक
धूमिल कर देता है!

 

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हिन्दी गजल

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’

जिन्दगी कुछ इस तरह, अपनी बनाओ दोस्तों |
गम के तूफानों से लड़ , उस पार जाओ दोस्तों |

पूर्ण धरती और गगन, पाने को है उपलब्ध जब,
जिस तरह जितना मिले, अपना बनाओ दोस्तों |

देश की खातिर मरें हम, प्रण हमारे दिल में हो,
देश पर बलिदान हो , अमरत्व पाओ दोस्तों |

 

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हिन्दी कविता ः वसंत बहार

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शिवेन्द्र शर्मा

आओ प्यारे मनमोहक, सबको इंतजार तुम्हारा है।
रंग बिरंगी वसुधा पर, स्वागत रितुराज तुम्हारा है।।

प्रकृति को श्रृंगारित कर, नई उमंगें लाया है।
तभी तो सारी रितुओं का,राजा ये कहलाया है।।

सूरज लागे नया नया, चंदा भी मुस्काया है।
हर्षित हैं सब लोग यहाँ, रितुराज जो आया है।।

 

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