बहरबद्ध हिन्दी गजल

Sagar, Sood, Sanjay, Kumar, Patiyala,, सागर सूद, pallawa, पल्लव

सागर सूद

यूँ कहने को तो पहुँचा है ये इन्सां आस्मानों में
मगर इंसानियत फिर भी यहाँ बिकती दुकानों में

नहीं किरदार अब बाकी यहाँ के हुक्मरानों में
ज़मीं तो खा चुके नज़रें गड़ी हैं आस्मानों में

हमारे सर पे होगा शामियाना गर बज़ुर्गों का
रहेगी हर ख़ुशी फिर देखना अपने मकानों में

 

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छन्दात्मक गजल

Jeeva, Raj, Budhathoki, जीवराज बुढाथोकी, pallawa, पल्लव

जीवराज बुढाथोकी

कल्पना मै हराएँ म ।
तर्कना मै रमाएँ म ।

मन्भरी तिर्सना बाेकी,
पाउ चाल्नै डराएँ म ।

गर्नु क्यै छैन भन्ने भाे,
त्यसमै मन् सजाएँ म ।

 

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