डॉ मिनाक्षी कहकशां की कुछ पङ्तियां की चार टुक्रे हिन्दीमें

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१)
सांपो की बस्ती में चलना सम्भल कर
हर इक शख्श यहाँ डसता मचल कर

चूमकर कपोल करता मदहोश तुमको
मारे डंक फिर तेरी जिव्हा कुचल कर

किसी से ना जुर्म उसका तू कह पाए
वास्ते वो जुवां तेरी रखता पकड़ कर

 

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विविध दोहावली “भारत माँ के लाल”

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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’’

निहित ज्ञान का पुंज है, गीता में श्रीमान।
पढ़ना इसको ध्यान से, इसमें है विज्ञान।।

जनता की है दुर्दशा, जन-जीवन बेहाल।
कूड़ा-कर्कट बीनते, भारत माँ के लाल।।

मामा शकुनि हो गये, बिगड़ गये हैं ढंग।
पक्षपात को देखकर, हुए भानजे दंग।।

 

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रूपचन्द शास्त्रीका हिन्दी दोहेः

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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’’

(मुखपोथी (फेसबुक) पर मेरे कुछ दोहे)
बिना किसी सम्बन्ध के, भावों का संचार।
अनुभव करते हृदय से, आभासी संसार।।

जालजगत पर उमड़ता, दूर-दूर से प्यार।
अच्छा लगता है बहुत, आभासी संसार।।

बिना किसी हथियार के, करते हैं सब वार।
भय से होता मुक्त है, आभासी संसार।।

 

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हिन्दी दोहे

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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’,

(दोहे “करना राह तलाश” )
जब तक प्राण शरीर में, सभी मनाते खैर।
धड़कन जब थम जाय तो, सब बन जाते गैर।।

विधि के अटल विधान पर, चलता नहीं उपाय।
पंच तत्व की देह तो, माटी में मिल जाय।।

कालचक्र को देखकर, होना मत भयभीत।
जो आया वो जायगा, जग की है यह रीत।।

 

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डॉ. राज सक्सेनाका पांच दोहे . . . . .

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

गई कहाँ प्रतिस्नेह में, पगी-सधी वह बात ।
वाक-युद्ध संग चल रहे, अब तो घूंसे लात ।।

फिर से रोजा होगया, बिना माह रमजान ।
मिली न रोजी आज भी, भूखा है उस्मान ।।

जिन्दे, नेता नोचते, मरे नोचते गिद्द ।
‘राज’ रोग हैं देश के, नेता सकल प्रसिद्ध ।।

 

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