पूनम पण्डित की हिन्दी दो टुक्रे

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पूनम पंडित

एक
तुम ही से माथे का कुमकुम ,
तुम ही से हाथों के कंगन।
मंगलसूत्र तुम ही से सजता ,
तुम ही से पायल की छनछन।

तुम ही से हैं सुबहो शाम ,
तुम ही से महके घर गाम।
रूप -सिंगार तुम ही से सजता ,
तुम ही से महका मन उपवन।

 

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पुनम पण्डित की सुन्दर हिन्दी मुक्तकें

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पूनम पंडित

मन में यही प्रतिज्ञा लेकर सबको आगे आना है।
सबको मिलकर हिंदी भाषा को महकाना है।
आँच आने पाये ना माता के गौरव पर कभी ,
अपनी मातृ भाषा को और समृद्ध बनाना है।

संस्कृत की बेटी है, उर्दू की प्यारी बहना है।
प्यारी हिंदी भाषा सब भाषाओँ का गहना है।
आओ सब मिलकर, प्रण करो साथियो ,
हिंदी भाषा को जन – जन की भाषा बनाना है।

 

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मोहन राज खनाल ‘चतुर्वेदी’ का केही ताङ्काहरूः

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मोहन राज खनाल ‘चतुर्वेदी’

समय सिङ्गो
आधार नयनमा
सब्य योजना
यथार्थमा जीवन
पदार्थमा जीवन ।।

सत्यार्थ बाटो
हिंड्न कष्ट मानब
लाज घुमौरी
अर्थ बिना गोविन्द
कष्ट बिना योगेन्द्र ।।

 

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डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क का हिन्दी गज़ल

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डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क

कितना करता है असर तूफ़ान देखा जाएगा
फिर यहाँ गुलशन मेरा वीरान देखा जाएगा ।

एक अदना फूल हूं बस इतनी है मेरी विसात
हौसले को तोड़कर गुलदान देखा जाएगा ।

राह में शोले हैं जख़्मी पांव खूं से तरबतर
और फिर आगे सफ़र आसान देखा जाएगा ।

 

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श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना के छे कविताएँ

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कुमारी अर्चना

1) भोजपुरी कविता
लाल लाल टमाटर देखs के
सबके जीव ललचाय हो गोरी
सबके जीव ललचाय

लाल टमाटर खाई के गोरी
लाल गाल दिखलाय हो गोरी
लाल गाल दिखलाय

पड़ल मँहगाई के अइसन मार
टमाटर गईल सौ रूपिया के पार
बिन गर्मी के पारा चढ़ल
सैतालिस के पार उ बढ़ल

 

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श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना का दो कविता

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श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना

१) “अलबेली चली अलबेला ढूढ़ने”
अलबेली की जब शादी की
उम्र हो आई तो / उसको अलबेला ढूढ़ने की सूझी
सोची चुटकी बजा कर / इस पहली को सुलझा दूँगी !
लव और अरैंज के विवाद में उलझी
पर किसको पता था वो
कई वर्षों के वनवास में फंसी !

कभी कॉलेज तो
तो कभी लाइब्रेरी तो
कभी केन्टीन तो
तो कभी पार्क में
कभी कोचिंग में
तो कभी पार्टियों में
फिर ना मिला वे छबिला !

 

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गजल

Vinata, Bhattari,,विनता भट्टराई , pallawa, पल्लव

विनता भट्टराई

कहिले त शरदको याम बनी आयौ
कहिले विवशतामा घाम बनी आयौ ।

घडीको सुइ झैँ धकेलिँदै यताकता
थकानमा फलैचा आराम बनी आयौ ।

गुलेलिको मट्याङ्ग्रा झैँ भर छैन तिम्रो
खिल परेको घाउमा डाम बनी आयौ ।

 

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राज सक्सेनाका एकदर्जन हिन्दी मुक्तकः

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’

बेचैन हर जगह थे, हम इस जहां में आकर ।
सोए नहीं थे कब से, महलों में चैन पाकर ।
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए-कब्र में आ,
कितना सुकूं मिला है, छोटे मकां में आकर ।
आगोशे कब्र = कब्र की गोद

सौ बार ये लगता है किस्मत, दीवार खड़ी कर देती है ।
आसान लग रही राहों में, अवरोध अधिक भर देती है ।
पर सच यह भी दृढनिश्चय ले, साहस से आगे बढो अगर,
होचुकी बाम ये किस्मत ही, पथ को समतल कर देती है ।

 

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“मावस का अंधेरा” मावस की अंधेर में

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कवयित्री कुमारी अर्चना

चकोर के आने इंतजार में
चाँद रात के द्वार पर खड़ा
कही निगल न लें अंधेरा! ये सब कुछ निगल लेता
पर कुछ पदचिन्ह नहीं छोड़ता
केवल अंधेरे के! किसी की खुशी को
किसी के अरमानों को
किसी के प्यार को
किसी के जहाँ को.. .. पहले चाँद को
धीरे धीरे खाता जाता
फिर चाँदनी को कैद़ करता
फिर सारे तारों की चमक
धूमिल कर देता है!

 

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हिन्दी गजल

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’

जिन्दगी कुछ इस तरह, अपनी बनाओ दोस्तों |
गम के तूफानों से लड़ , उस पार जाओ दोस्तों |

पूर्ण धरती और गगन, पाने को है उपलब्ध जब,
जिस तरह जितना मिले, अपना बनाओ दोस्तों |

देश की खातिर मरें हम, प्रण हमारे दिल में हो,
देश पर बलिदान हो , अमरत्व पाओ दोस्तों |

 

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हिन्दी कविता ः वसंत बहार

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शिवेन्द्र शर्मा

आओ प्यारे मनमोहक, सबको इंतजार तुम्हारा है।
रंग बिरंगी वसुधा पर, स्वागत रितुराज तुम्हारा है।।

प्रकृति को श्रृंगारित कर, नई उमंगें लाया है।
तभी तो सारी रितुओं का,राजा ये कहलाया है।।

सूरज लागे नया नया, चंदा भी मुस्काया है।
हर्षित हैं सब लोग यहाँ, रितुराज जो आया है।।

 

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पूनम पंडित की हिन्दी कविताएँ

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पूनम पंडित

कभी याद में, कभी इंतज़ार में ,
जिंदगी यूँ ही तमाम कटती रही।

मन मचलता रहा मै मनाती रही,
इंतजार की घड़ियाँ गिनती रही।
बस याद तुम्हें मै करती रही ,
जिंदगी यूं ही तमाम कटती रही।

 

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प्रेममा काँडा.

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भरत न्यौपाने

मैले त लगाएको थिएँ
चोखो र न्यानो माया तिमीलाई
तर त्यो मायालाई तिमीले
बुझ्ने प्रयास गरिनौ कवै
कस्तो सोच राखि छौ तिमीले
फुललाई काँडाँ सम्झि यौ
अबुझ रहेछ तिम्रो भावना नै
चोखो माया तिमीलाई काँडा भो
रहि नौ तिमी पहिले जस्ती
बद्लिए छ तिम्रो चालडाल नै
एकलाई छाडि हजार हजारमा
बाँडिएर घुम्फिर गर्न लागि छौ
के कम थियोर त्यो चोखो प्रेममा ?

 

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हिन्दी गजल

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डा. केवलकृष्ण पाठक

संयमित जीवन बिताना लक्ष्य है इंसान का
पर संयमहीन जीवन ही है बीतता आदमी

हो गया स्वाधीन फिर भी मानता पराधीन है
ऐसे वातावरण में खुश रहना चाहता आदमी

आज तो लगता है ऐसा आदमी निस्वार्थ है
धोखा दे के राज्य करना चाहता है आदमी

 

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कुमारी अर्चना की पाँच हिन्दी कविताएँ

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कुमारी अर्चना

१) “कौन पद्मावती”
इतिहास के पन्ने पर
जिसका केवल जिक्र भर ही है
कोई रोमानी कहानी सा लगता
आलाऊद्दीन ने पद्मावती के हुस्न के
जब चर्चे सुनके बाबरा सा हुआ
दर्पण में रूप के दर्शन कर
चितौड़ पर आक्रमण किया
रत्नसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ
पद्मवती ने सतित्व की रक्षा हेतु
जौहर किया और अन्य हरम़ की स्त्रीयों को–
अग्नीकुंड में काया को भष्माभूत करवाया
एक मुठ्ठी केवल राख आलाउद्दीन पाया–

 

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पल्लवका अध्यक्ष सहित १० लार्इ साहित्य रत्न सम्मान ।

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गोर्खे साइँलो

पल्लव साहित्य प्रतिष्ठानका अध्यक्ष सहित १० जानालार्इ साहित्य रत्न सम्मान ।
भारतको मेरठ स्थित ‘ग्रीन केयर सोसाइटी’ द्वारा आयोजनायोजित साहित्यिक कुम्भ कार्यक्रमलार्इ आई आई एम् टीयूनिवर्सिटीको सकृय सहयोगमा अन्तराष्ट्रीय स्तरको ‘मेरठ लिटरेरी फेस्टिवल’- २०१७ (2017), आयोजना भएको थियो । उक्त कार्यक्रम २०७२ मङ्सिरको ८, ९ र १० गते तीनदिन सम्म निकै नै सौहार्द वातावरणमा अति सव्य र भव्यरूपमा चलेको थियो । देश – विदेशका स्रष्टाहरूका पुस्तक प्रदर्शनी सहितको उक्त कार्यक्रमका प्रमुख अतिथि उत्तर प्रदेशको माननीय राज्यपाल श्री राम नाईक जी रहेका थिए ।

 

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डाँ. राजकिशोर ‘राज’का हिन्दी बालकविताः

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’

बाल रचना
चलो चलें मेले हम भाई
चाचू -चाची, ताऊ – ताई,
चले गए सब, मेले भाई ।
चंदु,चम्पा, चण्डी, चन्चल,
चलो चलें मेले हम भाई ।

मेले में जाइंट व्हील पर,
बैठेंगे हम सीट लाक कर ।
निकटधरा से नीलगगन तक,
आएं जाएँ, धीरज धर कर ।
डरे जरा तो, हुई हँसाई ।
चलो चलें , मेले हम भाई ।।

 

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डाँ. राजकिशोर ‘राज’का हिन्दी मुक्तकहरूः

Dr., Raj, Kishor, Raaj Saksena Raaj,  राज किशोर सक्सेना ‘राज’, pallawa, पल्लव

राज किशोर सक्सेना ‘राज’

जो लक्ष्य बना अपने, अभियान चलाते हैं
पथ घोर परिश्रम से, आसान बनाते हैं ।
कैसी भी पड़े विपदा,साहस जो नहीं खोते,
मस्तक पे मुकुट उनके, भगवान सजाते हैं ।।

तल्खिए-हालातेमाज़ी पर,घुमाकर कुंदनज़रों को
उठा कर दास्तान-ए-ग़म, कुरेदा बंद खबरों को ।
तिजोरी से जिगर की उठाए लफ़्ज, कुछ चुन कर,
मिलाकर दर्देदिल उनमें,लिखा है चंद सतरों को ।।

 

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नर्बेमा १०९, औं लक्ष्मी जयन्ती तथा रचना वाचन कार्यक्रम सम्पन्न !!!

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विष्णुमाया विभु

अन्तर्राष्ट्रिय नेपाली साहित्य समाज नर्बे (अनेसास, नर्बे) को आयोजनामा नर्बेको राजधानी ओस्लोमा १०९औं लक्ष्मी जयन्ती तथा साहित्यिक रचना वाचन कार्यक्रम सम्पन्न गरिएको छ। महाकवि लक्ष्मी प्रसाद देवकोटाको फोटोमा माल्यार्पण गरी सुरु गरिएको सो कार्यक्रमको सञ्चालन संस्थाका उपाध्यक्ष खुम ढकालले गर्नु भएको थियो भने संस्थाका सदस्य विकल्प अधिकारीले कार्यक्रममा उपस्थित सम्पूर्णलाई स्वागत गर्नु भएको थियो। समाजकी अध्यक्ष बिष्णुमाया विभुको सभाध्यक्ष तथा नेपालबाट पाल्नु भएका काठमाडौँ युनिभर्सिटिका पी. एच. डी. शोधकर्ता तथा शान्ति र सुशासन संस्था (काठमाडौँ, नेपाल) का अध्यक्ष श्री देवेन्द्र प्रसाद अधिकारीको प्रमुख आतिथ्यमा सम्पन्न भयो ।

 

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हिन्दी गजल

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सागर सूद

साथ मेरे है माँ की दुआ देखिए
जो भी माँगा है मुझको मिला देखिए ।

हाथ सर पर बुज़ुर्गों का होगा अगर
ज़िन्दगी जीने का फिर मज़ा देखिए ।

अलविदा कैसे कह दूँ बता दो उन्हें
ज़िन्दगी का हैं वो आसरा देखिए ।

 

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