नर्बेमा पहिलो पटक मोती जयन्ती मनाइयो

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विष्णुमाया विभु

अन्तर्राष्ट्रिय नेपाली साहित्य समाज नर्वे (अनेसास, नर्वे) को आयोजनामा नर्वेको बोडोमा १५२ औं मोती जयन्ती तथा रचना वाचन कार्यक्रम सम्पन्न गरिएको छ।
आयोजकहरुले उत्तर युरोपियन देश नर्वेमा पहिलो पटक मोती जयन्ती मनाउँदै एक ऐतिहासिक कार्यक्रम गर्न सफल भएका हुन्।
युवाकवि मोतीराम भट्टको फोटोमा माल्यार्पण गरी सुरु गरिएको सो कार्यक्रमको सञ्चालन संस्थाका सचिब बरुण पौडेलले गरेका थिए भने संस्थाका सदस्य सुदिप क्रान्ति तिवारीले कार्यक्रममा उपस्थित सम्पूर्णलाई स्वागत गरेका थिए।

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सागर सूदका हिन्दी गजल

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सागर सूद

कहीं नदियाँ, कहीं गुलशन, कहीं पर्बत ज़माने में
है हर इक रंग कुदरत का ख़ुदा के शामियाने में

ज़रा सोचो वो क्या सोचेगा अपने देश की ख़ातिर
हर इक पल जिसका कटता है यहाँ रोटी जुटाने में

ये कैसा दौर है इन्सानियत गुम है मेरे मालिक
मज़ा आता है लोगों को किसी का दिल दुखाने में

 

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कुमारी अर्चनाके हिन्दी तीन कविताएँ

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कुमरी अर्चना

१) “घर घर शौचालय हो जाये तो”
जॉनी ने कहा अपने मालिक से
मैं टहलने के लिए जा रहा हूँ
इधर उधर चलते चलते
सेर भी हो जाएगी
मैं हलका भी हो जाऊँगा!

तुम भी तो पहले मेरे जैसे
घर से कोसों दूर दूर
जाया करते थे टट्टी करने के लिए !

सेर कर अपने स्वास्थ के साथ
दोस्तों से गप्पे मारा कर
मन का बौझ भी उतारते थे
पर अब तुम दो कमरे के एक कोने में–

 

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“नंगी ही हूँ मैं”

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कुमरी अर्चना

नंगी ही हूँ मैं
कम कपड़ो में
बिन कपड़ो के
तो क्या हुआ
जब पुरूष हो सकते है
तो स्त्री क्यों नहीं?
वैसे तो हर कोई नंगा आता
और नंगा ही जाता है
बस नाम का कुछ बित्तों का
सफेद कफ़न जाता है
वो भी शरीर के साथ
आत्मा तो नंगी की नंगी रह जाती!

 

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जापान नेपाल सम्बन्ध

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जिज्ञान कुमार थापा,

(संयुक्त राष्ट्रसंघमा सहयोग)
सन् १९५६मा नेपाल र जापानले बिधिवत रुपमा कुटनैतिक सम्बन्धको स्थापना गरेका हुन। दोस्रो विश्व युद्धमा पराजित मुलुक जापानले संयुक्त राष्ट्रसंघको सदस्य बन्न पश्चिमेलि मुलुकहरुले सहयोग नगरिरहेको बेला, जापान संग कुटनैतिक सम्बन्ध गाँसेको नेपालले राष्ट्रसंघमा छिर्न जापानको साक्षी बसिदिएको थियो। त्यस ताका सम्म छिमेकी राष्ट्र भारत संग पनि जापानको कुटनैतिक सम्बन्ध थिएन। नेपाल जापान कुटनैतिक सम्बन्ध स्थापना भएको करिव १ बर्ष पछी सन् १९५७मा जापान ले भारत संग पनि कुटनैतिक सम्बन्ध स्थापना गरेको हो।

 

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“कागज ही तो मैं”

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विट्टु अर्चना

सफेद सी
रंगहीन सी
उजास सी
उपर से नीचे तक एक सी!
कागज सा है मेरा जीवन
कोरा
कुछ प्यार की बूँदे को
छिड़का था जब तुमने
पर भींग ना सका मेरा मन
परती जमीन सा फिर हो गया
ना कोई बीज जमीन की गर्भ में गया
ना कोई पौधा ही उगा सका
बस उजड़ का उजड़ रह गया!

 

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कैलाश राई सम्मानित, एम.एस. खान अभिनन्दित

Sikkim

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कुवेर भट्टरार्इ ‘अावाष’

(गान्तोक, २० अगस्त २०१७ । २६ औं नेपाली भाषा मान्यता दिवसमा पाँचौं अभियान’ लोकार्पित)
पूर्व सिक्किमको राङ्कामा वर्ष 2007 को 6 अप्रेलमा स्थापित अभियान साहित्य समितिद्वारा नेपाली भाषालाई भारतको संविधानको आठौं अनुसूचीमा गाभ्नमा सक्रिय भूमिका निर्वाह गर्ने सिक्किमका पूर्व मुख्यमन्त्री नरबहादुर भण्डारीको स्मृतिमा 26औं नेपाली भाषा मान्यता दिवस भव्यताका साथ पालन गरियो। नेपाली भाषाको विकासमा सक्रिय भूमिका निर्वाह गर्ने तथा सामाजिक कार्यकर्ता मोहन दुङ्मालीको अध्यक्षतामा सम्पन्न नेपाली भाषा मान्यता दिवस समारोहमा रूम्तेक-मार्ताम समष्टिका क्षेत्र विधायक डा. मिचुङ भोटियाको प्रमुख आतिथि रहेका थिए।

 

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बहरबद्ध हन्दी गजल

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सागर सूद

हमने तुमसे प्यार किया था लेकिन तुमको याद नहीं
सुख में दुख में साथ दिया था लेकिन तुमको याद नहीं

तुमको देखा तुमको चाहा तुम को पूजा जीवन भर
तुमको ही रब मान लिया था लेकिन तुमको याद नहीं

धन दौलत की कहते हो तुम ये तो छोटी बातें हैं
हमने तन मन वार दिया था लेकिन तुमको याद नहीं

 

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सागर सूदका दो हन्दी गजल

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सागर सूद

हन्दी गजल– १,
यूँ कहने को तो पहुँचा है ये इन्सां आस्मानों में
मगर इंसानियत फिर भी यहाँ बिकती दुकानों में

नहीं किरदार अब बाकी यहाँ के हुक्मरानों में
ज़मीं तो खा चुके नज़रें गड़ी हैं आस्मानों में

हमारे सर पे होगा शामियाना गर बज़ुर्गों का
रहेगी हर ख़ुशी फिर देखना अपने मकानों में

 

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हिन्दी गजल

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सागर सूद

मुहब्बत की रिवायत को यूँ हम दोनों निभायेंगे
कभी तुम याद आ जाना कभी हम याद आयेंगे

खफ़ा होने नहीं देंगे कभी इक दूसरे को हम
कभी तुम मुस्कुरा देना कभी हम मुस्कुरायेंगे

कोई कुछ भी कहे कहता रहे कहने दो आदत है
हमारा दिल जो चाहेगा वो हम करते ही जायेंगे

 

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पल्लवका दुइ स्रष्टा भारतको लखनऊमा सम्मानित तथा पुरस्कृत !!

Pallawa-Sahitiyak-E-Patrika-Logo, पल्लव साहित्यिक र्इ–पत्रिका

पल्लव साहित्यिक र्इ–पत्रिका

IMG_3636IMG_3812IMG_3703IMG_3808IMG_3758लखनऊ दिनाङ्कः १५ श्रावण २०७४, तदानुसार (३० जुलाई २०१७) । भारत कै सुप्रसिद्ध उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जयन्तीको सुरुआतमा प्रख्यात कवि शंकर जी सिंहको चतुर्थ कृति ‘स्मृतियों के दंश’ नामक काब्यसङ्ग्रहको विमोचन सहित स्रष्टा सम्मान तथा पुरस्कार हस्तान्त्रण कार्यक्रम सम्पन्न भएको थियो । त्यहाँको प्रान्तिय राज्यका राजपाल श्री माता प्रसाद जीको मुख्य अतिथि र स्वास्थ्यमन्त्रीका प्रतिनिधी र वयोवृद्ध प्रख्यात कविहरूको विशेष आतिथ्यमा चलेको अति नै सिष्ट, सब्य र भब्य कार्यक्रममा भरतका विभिन्न प्रान्तहरू र नेपालबाट आमन्त्रित अतिथिहरू हुनुहुन्थ्यो ।

 

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बहरबद्ध हिन्दी गजल

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सागर सूद

यूँ कहने को तो पहुँचा है ये इन्सां आस्मानों में
मगर इंसानियत फिर भी यहाँ बिकती दुकानों में

नहीं किरदार अब बाकी यहाँ के हुक्मरानों में
ज़मीं तो खा चुके नज़रें गड़ी हैं आस्मानों में

हमारे सर पे होगा शामियाना गर बज़ुर्गों का
रहेगी हर ख़ुशी फिर देखना अपने मकानों में

 

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शंकर जी सिंह के कुछ मेरी काव्य संकलन कि टुकुडें

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शंकर जी सिँह

(“स्मृतियों के दंश” से)
प्रेम आँच से सज जाती तू
स्वाभिमान से तन जाती तू
तू लड़ती मैं तुम्हें मनाता
काश ! प्रेमिका बन जाती तू।
*
सिसकी – संग पीड़ा की कैसी कराह हैं
गाँव – गाँव बाढ़ में हो रहे तबाह हैं
मुखिया के घर पर मुजरे का जश्न है
दरबार हैं, सभासद हैं , और वाह ! वाह ! हैं
नम्बर दो के पैसे से कोठी भी धनी आज
बूढा भी कर रहा गरीब कन्या से निकाह हैं
ऐसे में क्यों नही किसी जाति का झुका सिर
सो गए हैं मंदिर क्या, गुरुद्वारा , ईदगाह हैं?
कितने की गई जान कितने ही गाँव बहे
गुस्साई हुई नदी का यह कैसा प्रवाह हैं
सिसकी संग——————- कैसी कराह हैं
गुस्साई हुई ————————-कैसा प्रवाह हैं
*

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मनहरण

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अंकुर शुक्ल

माँ के दिल जैसा दिल,दुनिया में कोई नहीं
माँ का दिल प्रेम त्याग, ममता की खान है

पूजता हूँ माँ को सदा,तंग नहीं करता हूँ
जननी है वो तो मेरी,माँ तो भगवान है

रूप भी मिला उसी से,रंग भी मिला उसी से
उससे मेरा वजूद ,मेरी पहचान है

 

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हिन्दी गजल

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लक्ष्मी श्रीवास्तवा ‘कादम्बिनी’

कभी दूरियाँ कभी मजबूरियाँ लिखो तुम
लगाओ दिल पर मरहम आरियां लिखो तुम

बात निकलीं हैं तो जिगर में उतर जायें
ऐसी बातें कुछ दुधारियाँ लिखो तुम

इश्क होता है तो क्यूं चैन खो जाता है
इश्क की सारी बिमारियाँ लिखो तुम

 

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डॉ.अजय श्रीवास्तव ‘अश्क’का हिन्दी मुक्तकः

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डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क

तुम्हारा दो मुहा चेहरा हमें भाता नहीं सच है।
इसी से मैं तुम्हारे घर कभी आता नहीं सच है।।
तुम्हारी असलियत सब जान जाएंगे इसी कारण।
तुम्हारे जुल्म के किस्से मैं बतलाता नहीं सच है।।

गीदड़ों छुप के वार करना अगर जारी है।
तो तीन रंग का ये हौसला भी भारी है।।
लहू को तेल और खुद को बनाकर बाती।
हवा में दीप जलाने कि जिद हमारी है।।

 

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हिन्दी गजल

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कोमल गुप्ता

याद तेरी ही आती रही रात भर,
गीत तेरे ही गाती रही रात भर।

बस तेरा नाम आता ही आता रहा,
सोचकर कुछ लजाती रही रात भर।

कोई सन्देश आया नहीं आज जब
कल के सपने सजाती रही रात भर।।

 

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कोमल गुप्ता की हिन्दी ग़ज़ल

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कोमल गुप्ता

ख़ुदा तुमसे किये वादे मुझे बेशक़ निभाना है
तुम्हारे पास ही मुझको मकाँ अपना बनाना है

बताऊ क्यूँ भला तुमको , यहाँ क्या करने आई थी
यहाँ जो कऱ ने आई थी मुझे वो कर के जाना है

सजाये थे बहुत सपने जो बचपन में कभी मैंने
मुझे उनको लगाकर पर जरा सा अब उड़ाना है

 

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राज सक्सेना ‘राज’का एक दर्जन हिन्दीमुक्तकहरूः

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

बेचैन हर जगह थे, हम इस जहां में आकर
सोए नहीं थे कब से,महलों में अपने जाकर ।
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए-कब्र में आ,
कितना सुकूं मिला है, छोटे मकां में आकर ।।

बात जारी है अभी, इसकी र वानी रखिये
रात बाकी है सभी, इसको सुहानी रखिये ।
मोड़ पर क्यूँ भला, छोड़ी है कहानी लाकर,
खत्म ऐसे ना कभी , कोई कहानी करिये ।।

 

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