डॉ.अजय श्रीवास्तव ‘अश्क’का हिन्दी मुक्तकः

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डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क

तुम्हारा दो मुहा चेहरा हमें भाता नहीं सच है।
इसी से मैं तुम्हारे घर कभी आता नहीं सच है।।
तुम्हारी असलियत सब जान जाएंगे इसी कारण।
तुम्हारे जुल्म के किस्से मैं बतलाता नहीं सच है।।

गीदड़ों छुप के वार करना अगर जारी है।
तो तीन रंग का ये हौसला भी भारी है।।
लहू को तेल और खुद को बनाकर बाती।
हवा में दीप जलाने कि जिद हमारी है।।

 

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हिन्दी गजल

Komal, Gupta, कोमल गुप्ता, कोमल , pallawa, पल्लव

कोमल गुप्ता

याद तेरी ही आती रही रात भर,
गीत तेरे ही गाती रही रात भर।

बस तेरा नाम आता ही आता रहा,
सोचकर कुछ लजाती रही रात भर।

कोई सन्देश आया नहीं आज जब
कल के सपने सजाती रही रात भर।।

 

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कोमल गुप्ता की हिन्दी ग़ज़ल

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कोमल गुप्ता

ख़ुदा तुमसे किये वादे मुझे बेशक़ निभाना है
तुम्हारे पास ही मुझको मकाँ अपना बनाना है

बताऊ क्यूँ भला तुमको , यहाँ क्या करने आई थी
यहाँ जो कऱ ने आई थी मुझे वो कर के जाना है

सजाये थे बहुत सपने जो बचपन में कभी मैंने
मुझे उनको लगाकर पर जरा सा अब उड़ाना है

 

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राज सक्सेना ‘राज’का एक दर्जन हिन्दीमुक्तकहरूः

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राज किशोर सक्सेना ‘राज’,

बेचैन हर जगह थे, हम इस जहां में आकर
सोए नहीं थे कब से,महलों में अपने जाकर ।
न खुली है नींद मीठी, आगोश-ए-कब्र में आ,
कितना सुकूं मिला है, छोटे मकां में आकर ।।

बात जारी है अभी, इसकी र वानी रखिये
रात बाकी है सभी, इसको सुहानी रखिये ।
मोड़ पर क्यूँ भला, छोड़ी है कहानी लाकर,
खत्म ऐसे ना कभी , कोई कहानी करिये ।।

 

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डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क का हिन्दी गीत

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डॉ. अश्क अजय श्रीवास्तव

ख्वाब आँखों से हरगिज मिटाना नही।
तुम मेरे प्यार को आजमाना नहीं।

मन है चंचल बहुत ये तो भटकेगा ही।
चांद के झुरमुटों में तो अटकेगा ही।।
रूप दर्पन में अपना निरखना नहीं।
और निरखना कभी तो परखना नहीं।।
गर परख भी लिए तो बताना नहीं…
तुम मेरे प्यार को आजमाना नहीं।।

 

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मुक्तक सहित गजल

Varsha, Crmma, Sikkim, वर्षा शर्मा, , pallawa, पल्लव

वर्षा शर्मा,

जब छुट्यो साथ तिम्रो जीवन यो काल भो
तिमी बिनाको एक दिन यो हजारौ साल भो ।

गरेको थिए साँचो प्रेम मैले त तिमीलाई
जब तिमी नै छाड़ी गयौ प्रेम चण्डाल भो ।

याद आँउछ अझै झल-झल तिम्रो मुहारको
अतीतका बात सम्झी मन मेरो बेहाल भो ।

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हिन्दी गजल

Kawayitri, Samixa, sinha, Jadoin, कवयित्री समीक्षा सिंह जादौन, pallawa ,पल्लव

समीक्षा सिंह जादौन

कभी भी ना सताने की कसम खाते रहे सारे
हमें अपना बनाने की कसम खाते रहे सारे ।

हमारा दिल नहीं टूटा कभी मायूस होकर जब
हमें फिर आज़माने की कसम खाते रहे सारे ।

छुपाया है हमीं से सब हमारे रहनुमाओं नें
हमीं को सच बताने की कसम खाते रहे सारे ।

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भाल चन्द्र शीश गंग

Ratna, Mani, Tiwari, Batsha, रत्नमणि तिवारी " वर्षा", PALLAWA , पल्लव

रत्नमणि तिवारी ” वर्षा”

भाल चन्द्र शीश गंग ,
भंग रंग अंग-अंग
होली हुडदंग ये तो
शिव को भी भाते हैं

डमरू बजाते और
कर में त्रिशूल धार
लपेटे भुजंग संग
ब्रज चले आते हैं

कृष्णा संग नाच रही
गोपियों को देख कर
नाचने को संग-संग
ये भी ललचाते हैं

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‘जन्म से पहले मुझे न मारो’

Surekha,, Sharma, सुरेखा शर्मा, pallawa, पल्लव

सुरेखा शर्मा

जन्म से पहले मुझे न मारो’
देख रही हूं मिटता जीवन ,
छाया घोर अन्धेरा।

हरपल जकड़े पथ में मुझको,
शंकाओं का घेरा।
मेरे जीवन की डोरी को,
माता यूं मत तोड़ो।

मैं भी जन्मूं इस धरती पर,
मुझे अपनों से जोड़ो ।
क्यों इतनी निष्ठूर हुई माता,
क्या है मेरी गलती।
हाय विधाता कैसी दुनिया
नारी को नारी छलती।

 

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माँ चिन्तपूर्णी चिन्ता में

Surekha,, Sharma, सुरेखा शर्मा, pallawa, पल्लव

सुरेखा शर्मा

व्यंग्य–
नारायण •••नारायण ••”माते, यह मैं क्या देख रहा हूं ••!जगत की चिंता दूर करने वाली माँ चिन्तपूर्णी आज स्वयं चिन्तित हैं •••क्या बात है माँ ,आप किस दुविधा में हैं ?” माँ दुर्गा कुछ विचार करते हुए बोली, ‘तुम नहीं समझोगे नारद ।’
“माते,जब तक आप कुछ बताएंगी नहीं तो मैं कैसे समझूंगा भला नारायण •••नारायण। ” तुम जानते हो नारद, आजकल भूलोक वासी पूजा-पाठ बहुत करने लगे हैं ।मेरे भक्तों की संख्या दिन- पर -दिन बढ़ती जा रही है ।तुम देखना आने वाले इन नौ दिनों में तो चारों ओर मेरा ही गुणगान किया जाएगा ।भूखे- प्यासे रहकर उपवास कर नवरात्र अनुष्ठान संपन्न करेंगे । उपवास तो कहने मात्र के लिए होते हैं, सारा दिन फलाहार के नाम पर इतना खाते हैं कि पूछो मत।”

 

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रंगरेज पिया

Luxmi, Srivastava,लक्ष्मी श्रीवास्तवा 'कादम्बिनी'. pallawa, पल्लव

लक्ष्मी श्रीवास्तवा ‘कादम्बिनी’

अबकी खेलुंगी फाग पिया संग
रंगरेज चुनरिया रंग कोरी
बलम संग ही खेलूं होरी
पिछले बरस का फागुन
भूली नहि सखी रे
रंग डाला सब ने बरजोरी
रंगरेज चुनरिया रंग कोरी
हूँ प्रीति बांवरिया मैं
प्रीतम से खेलूंगी होरी
बसंती हवायें हुई फागुनि –

 

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हम अवांछित हो चुके हैं प्रेम का अपराध कर के

Kawayitri, Samixa, sinha, Jadoin, कवयित्री समीक्षा सिंह जादौन, pallawa ,पल्लव

समीक्षा सिंह जादौन,

पाप कितने ढो चुके हैं पुण्य का प्रतिवाद कर के
हम अवांछित हो चुके हैं प्रेम का अपराध कर के ।

धीर भी है, पीर भी है, नीर भी बहता रहा है
वेदनाओं की व्यथाएं दिल मेरा सहता रहा है
जग कभी समझा नहीं प्रिय प्रेम की आराधना को
भावनाएं मर गईं हैं व्यर्थ का संवाद कर के
हम अवांछित हो चुके हैं प्रेम का अपराध कर के ।

कर्म को ही धर्म समझा, मर्म को ना जान पाए
हम तुम्हारे नेह में अपमान ना पहचान पाए
जानते हैं सत्य को प
र मान हम पाते नहीं है
क्यों कलंकित हो चुके हैं नित्य हम अवसाद करकेहम अवांछित हो चुके हैं प्रेम का अपराध कर के ।

 

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हिन्दी गजल

Kawayitri, Samixa, sinha, Jadoin, कवयित्री समीक्षा सिंह जादौन, ,पल्लव

कवयित्री समीक्षा सिंह जादौन

जब से हम अन्जान हो गए
सब कौए सुल्तान हो गए

भोर गुजारी राम जाप में
शाम तलक रमजान हो गए

है मन का विश्वास ही तो’ यह
पत्थर भी भगवान् हो गए

 

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विविध दोहावली “भारत माँ के लाल”

dr. Roopchandra, Shastri, Mayank, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’, pallawa , पल्लव

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’’

निहित ज्ञान का पुंज है, गीता में श्रीमान।
पढ़ना इसको ध्यान से, इसमें है विज्ञान।।

जनता की है दुर्दशा, जन-जीवन बेहाल।
कूड़ा-कर्कट बीनते, भारत माँ के लाल।।

मामा शकुनि हो गये, बिगड़ गये हैं ढंग।
पक्षपात को देखकर, हुए भानजे दंग।।

 

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हिन्दी गजल

dr.,Ajay, Srivastava, Ashk, basti, अजय श्रीवास्तव "अश्क", pallawa, पल्लव

डॉ. अश्क अजय श्रीवास्तव

कितना करता है असर तूफ़ान देखा जाएगा।।
फिर यहाँ गुलशन मेरा वीरान देखा जाएगा।।

एक अदना फूल हूं बस इतनी है मेरी विसात।
हौसले को तोड़कर गुलदान देखा जाएगा।

राह में शोले हैं जख़्मी पांव खूं से तरबतर।
और फिर आगे सफ़र आसान देखा जाएगा।।

 

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रूपचन्द शास्त्रीका हिन्दी दोहेः

dr. Roopchandra, Shastr,i Mayank, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’, pallawa ,  पल्लव

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’’

(मुखपोथी (फेसबुक) पर मेरे कुछ दोहे)
बिना किसी सम्बन्ध के, भावों का संचार।
अनुभव करते हृदय से, आभासी संसार।।

जालजगत पर उमड़ता, दूर-दूर से प्यार।
अच्छा लगता है बहुत, आभासी संसार।।

बिना किसी हथियार के, करते हैं सब वार।
भय से होता मुक्त है, आभासी संसार।।

 

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डॉ. अश्क का हिन्दी गजल

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,डॉ. अजय श्रीवास्तव”अश्क”

ये दुनिया खूबसूरत ये नजारा छोड़ जाऊंगा।
चमकता प्यार का तेरे सितारा छोड़ जाऊंगा।।

यहीं जन्नत, जहन्नम और जन्नत में मिला जो भी।
ये कलियाँ, फूल, खुशबू, बाग सारा छोड़ जाऊंगा।।

रंगा जीवन गुलबी, लाल, धानी रंग से जो है।
तुम्हारे प्यार का यह रंग प्यारा छोड़ जाऊंगा।।

 

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‘मेरे साथ मां है’ !

dr. ask, ajaya, shreevastab,डॉ. अजय श्रीवास्तव"अश्क", pallawa, पल्लव

डॉ. अजय श्रीवास्तव”अश्क”

हां मैं तुमसे बहुत दूर हूँ!
क्या क्या छोड़ देता तुम्हारे लिए?
मां, बाप, भाई और वो बहनें जिन्होंने मेरी कलाई पर प्यार का धागा बांधा।
हां सच है मैं तुमसे हर दुख हर पीड़ा कह देता था।
तुम्हें हर दर्द की दवा समझ बैठा था।
लेकिन सच मैं तुम्हें समझ न सका!
तुम्हारे छलात्मक स्नेह को सच्चा प्रेम
समझ बैठा।
खैर!
हमारी जिन्दगी तो सुलगती हुई सिगरेट की तरह हैं!
अपना हर दर्द सिगरेट के कश की तरह मुंह से निकलते हुए धुंए में उड़ा देता हूँ !
तुम्हें पता तो है मैं आज भी यहीं हूं!
लेकिन तुम सभी से बहुत दूर!
मैं अपने परिवार से रूठा तो तुम सोचे मैं सदियों से बने रिश्ते ही तोड़ दूं!
नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता
इसलिए आज तुमसे दूर हूँ ।

 

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हिन्दी दोहे

dr. Roopchandra, Shastr,i Mayank, डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’, pallawa ,  पल्लव

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’,

(दोहे “करना राह तलाश” )
जब तक प्राण शरीर में, सभी मनाते खैर।
धड़कन जब थम जाय तो, सब बन जाते गैर।।

विधि के अटल विधान पर, चलता नहीं उपाय।
पंच तत्व की देह तो, माटी में मिल जाय।।

कालचक्र को देखकर, होना मत भयभीत।
जो आया वो जायगा, जग की है यह रीत।।

 

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