देवीढकाल, चितवन को संस्मरणः संझनामा बर्माको मिचिना शहरका छ दिन

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ठाकुरप्रसाद गुरागाईं

(रचनाकारः देवीढकाल, चितवनः संझनामा बर्माको मिचिना शहरका छ दिन)
मिचिनाबाट २६ गते चैत्रमा फर्कदा रेलमा फर्कियौं! दिउसो दश बजे चढेको रेलबाट बर्माको कचिन राज्यको भू-वनौटलाई नियाल्दा नियाल्दै सूर्यास्त सँगै मेरो हेर्ने चाहनाले पूर्ण विराम लियो ! बेलैमा कोशेली खाएँ! सूर्यास्त पहिले नै मिले र भए सम्म वेलुकाको खाना खाने वानीलाई वाराकोटी परिवारले पठएको कोशेलीले सम्भव वनायो! त्यो परिवारलाई कुन शब्दले धन्यवाद दिने त्यो मार्मिक प्रश्नको चित्त वुझ्दो जवाफ म संग छैन ! समयमा नै खाना भयो त्यसले गर्दा म आठ बजे पछि स्लिपरको माथिल्लो बेडमा गएँ !

 

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मोहन राज खनाल का दुइ टुक्राः

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मोहन राज खनाल ‘चतुर्वेदी’

१)

उमेर बड्छ
अपराध टुङ्गेन
जीवन यात्री
एक पद घाटमा
अर्को पद घातमा ।
*
सुरिने मात
निधन धर्म कर्म
आचार भ्रष्ट
बलबाहू सुर्किने
धन दाऊ उफ्रिने।
*

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पूनम पंडित की हिन्दी कवितायें

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पूनम पंडित

पीली चूनर ओढ़ कर, मां धरा रही मुस्काय ।
पुलकित सबका मन भया, खुशी ना वरनी जाय ।

खुशी ना वरनी जाय, सभी मिल मोद मनायें ।
मां के आंचल से लिपट, झूमे और गायें ।

देख मात का रूप, सुधि भूला हर जन मन ।
बच्चों की किलकारियों से, गुंजित हुआ उपवन ।

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां का हिन्दी में छे कविताएँ

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१) कटी
अंगुलियां
बरसों पहले सुनी थी
वो कहानी
जिसे आज साक्षात
देख भी लिया
एक बालक
एक कसाई के यहाँ
नोकरी करता था
काम के
बदले में मिल जाती थी
दो वक़्त की
रोटी–

 

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डॉ मिनाक्षी कहकशां की कुछ हिन्दी कविताएँ

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१) कल रात
उसे बड़े दिनों बाद
मेरी याद हो आयी
और आ गया
अपने प्यारे साज़,
छैनी और हथौड़ा लेकर
और शुरू हो गया
मेरे सुफ्त भावों पर
चोट कर कर
छील डाला मेरा जिस्म
सँवारने की कोशिश में–

 

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डॉ मिनाक्षी कहकशां की कुछ पङ्तियां की चार टुक्रे हिन्दीमें

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१)
सांपो की बस्ती में चलना सम्भल कर
हर इक शख्श यहाँ डसता मचल कर

चूमकर कपोल करता मदहोश तुमको
मारे डंक फिर तेरी जिव्हा कुचल कर

किसी से ना जुर्म उसका तू कह पाए
वास्ते वो जुवां तेरी रखता पकड़ कर

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां का हिन्दी में पाँच कविताएँ

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१) आज मैं
सो रही हूँ
मुझे
जगाना मत
संगतराश
तू बरसों से
जगा रहा है
मुझे
ठोंक ठोंक कर
ज़रा सा भी
नहीं सोचा तूने
की चोट लगती है –

 

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हिन्दी कविताः मुझे याद हैं

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विजय पंडित

वो लम्हे
आते जाते हर सफर में
होती थी जब
किताब सबके हाथ में
सच्चे मित्र जैसे
हर पल
साथ निभाती पुस्तके
राह दिखाती..
पुस्तको में
वो खतों का
आदान प्रदान.. –

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां का हिन्दी कविताएँ

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

आज
फिर वो फरिश्ता
चुपचाप बैठ गया
मेरे सामने,
निहारता रहा मुझे
मैं सो रही थी
पर कैसे सोती
जैसे चांदनी रात में
सूरज चमक उठा हो,
ऐसे ही उसकी
मुहब्बत भरी किरणें
मेरी पलकों पे पड़ी
और मैं चुँधिया कर
जाग गई,–

 

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पूनम पंडित की कुछ पङ्तियाँ

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पूनम पंडित

अचानक हो रहा है कुछ नया सा एहसास।
मचल रहे हैं अरमान, जग रहे हैं सुप्त प्राण।

मन करता है, मैं भी मनाऊँ त्यौहार।
बाँधू राखी, भाई की कलाई पर।
लगाऊँ मंगल टीका, उतारूं नज़र।
तीज मनाऊँ, जाऊँ बाबुल के घर।

लौट जाऊँ , बचपन के आँगन में।
पेड़ों पर झूले डालूँ, झूलूँ सावन में।
विचरूँ उन्मुक्त बाबुल के कानन में।
बच्चों संग अलमस्त खेलूँ आँगन में।

 

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टेकनारायण रिमाल”कौशिक” का आधा दर्जन मुक्तकः

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टेकनारायण रिमाल ‘कौशिक’

नमस्कार
नमस्कार सबै मेरा देव-पितृ-गुरुकन
नमस्कार सबै मेरा आफन्त र अरुकन
यी दुवै हात जोडेर मुस्कुराएर प्रेमले
नमस्कार सबै मेरा फेबु मित्रहरूकन ।।१।।

जायज़
आमा राष्ट्रपति प्रफुल्ल मनले आशीष दिन्छिन् लिनू
नाना भाँति भनी विवाद गरिने कौटिल्य छाडीदिनू
आमाका अगि टेक्न जायज घुँडा राजा भए तापनि
नाना शास्त्रहरू पढी बुझिलिनू आचारमा बाँधिनू ।।२।।

 

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मोहन राज खनाल का केही मुक्तकहरूः

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मोहन राज खनाल ‘चतुर्वेदी’

हाम्रो गौरव नेपाल जस्तै बर्मेलीको आगनमा
हाम्रो सौरव हिमाल जस्तै बर्मेलीको आगनमा
स्वच्छ शान्त बुद्ध भूमी स्वयंभूको दर्शन
हाम्रो गौरव श्री नाथ जस्तै बर्मेलीको आगनमा ।

हाँसे पनि हामीनैंहौं रोए पनि हामी
नाचे पनि हामीनैंहौं गाए पनि हामी
सुख दुख तातो छारो जीवनी माया
लाए पनि हामीनैंहौं छाए पनि हामी ।

 

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हिन्दीमा प्रेरक प्रसंग

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विजय पंडित

नगर की प्रसिद्ध वैश्या की गली से एक योगी जा रहा था कंधे पर झोली डाले। योगी को देखते ही एक द्वार खुला। सामने की महिला ने योगी को देखा। ध्यान की गरिमा से आपूर, अंतर मौन की रश्मियों से भरपूर। योगी को देखकर महिला ने निवेदन किया गृह में पधारने के लिए। उसके आमन्त्रण में वासना का स्वर था।योगी ने उत्तर दिया,” देखती नहीं झोली में दवाएं पड़ी हैं, गरीबों में बांटनी हैं उन्हें रोगों से मुक्त करना है। हमारे और तुम्हारे कार्य में अंतर है तुम रोग बढ़ाती हो, हम रोग मिटाते हैं। तुम शरीर और वासना की भाषा बोलती हो, हम सत्य और बोध की।”

 

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पूनम पण्डित की हिन्दी दो टुक्रे

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पूनम पंडित

एक
तुम ही से माथे का कुमकुम ,
तुम ही से हाथों के कंगन।
मंगलसूत्र तुम ही से सजता ,
तुम ही से पायल की छनछन।

तुम ही से हैं सुबहो शाम ,
तुम ही से महके घर गाम।
रूप -सिंगार तुम ही से सजता ,
तुम ही से महका मन उपवन।

 

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पुनम पण्डित की सुन्दर हिन्दी मुक्तकें

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पूनम पंडित

मन में यही प्रतिज्ञा लेकर सबको आगे आना है।
सबको मिलकर हिंदी भाषा को महकाना है।
आँच आने पाये ना माता के गौरव पर कभी ,
अपनी मातृ भाषा को और समृद्ध बनाना है।

संस्कृत की बेटी है, उर्दू की प्यारी बहना है।
प्यारी हिंदी भाषा सब भाषाओँ का गहना है।
आओ सब मिलकर, प्रण करो साथियो ,
हिंदी भाषा को जन – जन की भाषा बनाना है।

 

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मोहन राज खनाल ‘चतुर्वेदी’ का केही ताङ्काहरूः

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मोहन राज खनाल ‘चतुर्वेदी’

समय सिङ्गो
आधार नयनमा
सब्य योजना
यथार्थमा जीवन
पदार्थमा जीवन ।।

सत्यार्थ बाटो
हिंड्न कष्ट मानब
लाज घुमौरी
अर्थ बिना गोविन्द
कष्ट बिना योगेन्द्र ।।

 

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डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क का हिन्दी गज़ल

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डॉ.अजय श्रीवास्तव अश्क

कितना करता है असर तूफ़ान देखा जाएगा
फिर यहाँ गुलशन मेरा वीरान देखा जाएगा ।

एक अदना फूल हूं बस इतनी है मेरी विसात
हौसले को तोड़कर गुलदान देखा जाएगा ।

राह में शोले हैं जख़्मी पांव खूं से तरबतर
और फिर आगे सफ़र आसान देखा जाएगा ।

 

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श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना के छे कविताएँ

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कुमारी अर्चना

1) भोजपुरी कविता
लाल लाल टमाटर देखs के
सबके जीव ललचाय हो गोरी
सबके जीव ललचाय

लाल टमाटर खाई के गोरी
लाल गाल दिखलाय हो गोरी
लाल गाल दिखलाय

पड़ल मँहगाई के अइसन मार
टमाटर गईल सौ रूपिया के पार
बिन गर्मी के पारा चढ़ल
सैतालिस के पार उ बढ़ल

 

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श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना का दो कविता

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श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना

१) “अलबेली चली अलबेला ढूढ़ने”
अलबेली की जब शादी की
उम्र हो आई तो / उसको अलबेला ढूढ़ने की सूझी
सोची चुटकी बजा कर / इस पहली को सुलझा दूँगी !
लव और अरैंज के विवाद में उलझी
पर किसको पता था वो
कई वर्षों के वनवास में फंसी !

कभी कॉलेज तो
तो कभी लाइब्रेरी तो
कभी केन्टीन तो
तो कभी पार्क में
कभी कोचिंग में
तो कभी पार्टियों में
फिर ना मिला वे छबिला !

 

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गजल

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विनता भट्टराई

कहिले त शरदको याम बनी आयौ
कहिले विवशतामा घाम बनी आयौ ।

घडीको सुइ झैँ धकेलिँदै यताकता
थकानमा फलैचा आराम बनी आयौ ।

गुलेलिको मट्याङ्ग्रा झैँ भर छैन तिम्रो
खिल परेको घाउमा डाम बनी आयौ ।

 

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