डॉ मिनाक्षी कहकशां की कुछ हिन्दी कविताएँ

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१) कल रात
उसे बड़े दिनों बाद
मेरी याद हो आयी
और आ गया
अपने प्यारे साज़,
छैनी और हथौड़ा लेकर
और शुरू हो गया
मेरे सुफ्त भावों पर
चोट कर कर
छील डाला मेरा जिस्म
सँवारने की कोशिश में–

 


मैं तड़प रही थी
जब वो अपनी
छैनी की नोंक से
मुझे परत दर परत
छील रहा था
दर्द हो रहा था मुझे
इतना ही नहीं
जब मेरी चींख निकलती
तो वो उस पर हथोड़े से
एक और चोट मार देता
चोट मारता था वो
ऊपर से और दर्द होता था
मुझे भीतर तक
टीस निकल जाती थी
मुझे तराशने के जोश में
ऊपर चढ़ जाता था
उसके बोझ के साथ
मिलकर हथोड़े की चोट
और तेज़,
बहुत तेज महसूस होती थी
मैं चींखती रही थी
करहा रही थी
मगर
मानो मेरे करहाने से उसे
और आनन्द आ रहा था
अपने जुनून में
लगा पड़ा था
एक मदमस्त हाथी की तरह
या कहूँ
एक खूँखार शेर की भाँति
मेरे अंदर तक घुसा दिया
उसने छैनी की सहायता से
अपने हथोड़े को
कब तक करेगा वो
अपनी ये कलाकारी
पता नहीं,,

२) आज की रात
एक क़ातिलाना रात थी
वो संगतराश आ गया
अपनी वही नोंकदार
कलम लेकर ।
आ गया वो फ़रिश्ता
ज़िद पड़ अड़ गया
लिखने के लिये
मैं दर्द से करहा रही थी
हाँ मन
खुशी का
अनुभव भी कर रहा था
क्योंकि
जब स्याही कोरे पन्ने पर,
अपना अक्स छोड़ती है,
तो एक नया
क्रिएशन होता है
इसी कारण वो पीड़ा
मुझे मीठी लग रही थी
इसीलिए
मैने उसे
मना नहीं किया
वो नुकीली कलम को हाथ में लेकर,
कभी मेरे ऊपर
कभी नीचे,
हर कोने से कुरेद कुरेद
लिख रहा था
अपने अहसास की
लम्हों से,
मेरे सूखे हुए जज्बातों
को गिला कर,
कलम की सुर्ख लाल
स्याही को
मेरे कोरे लम्हों पर
बिखेर कर
बहाता जा रहा था
एक ही आवाज़ बस
टप टप टप,,

३) कल रात
मुझे तुम्हारी
गर्म साँसों ने छुआ,
हमारी गुनगुनी साँसे
आपस में ऐसे मिल गईं
कि पता ही नहीं चल
रहा था,
तेरी साँसे कौन – सी हैं
सच तो ये है
कल हम
अपनी – अपनी
साँसें नहीं ले रहे थे
बल्कि दोनो शरीरों में
एक दूसरे की सांसों का
आवागमन हो रहा था
या यूँ कहूँ हम
एक साँस को जी रहे थे,
सुना था प्रेम में
ऐसा होता है
कल साक्षात
महसूस भी कर लिया,
तुमने मुझे अपनी बाहों में
जकड़ लिया
और चिपक गये
एक जोंक की तरह
जोंक खून चूसती है ना
ऐसे ही हम एक दूसरे को
चूस रहे थे
चिपक कर एक ,
ज़रा- सी सन्ध भी नहीं थी
बीच में,
फिर भी
साँसे आ जा रही थी,
तुम हाथ फिराते
मेरे कोरे बदन पर
और
कंपकंपी उठ जाती
मेरी रूह में,
झंकझोर डाला तुमने
मेरा पूरा बदन
वो बदन जो
पत्थर समान हो गया था
जिसमें कोई
अहसास ही नहीं था
बरसों से कोई
हलचल ही नहीं थी
एक मूर्ति की तरह
पत्थर की मूर्ति की तरह
निष्प्राण,
जिये जा रही थी मैं
अचानक
तुम लपके
मेरी तरफ
और
मेरे लबों को चूसने लगे
निचोड़ कर
सारा रस पी रहे थे।
बससस्स
तुम्हारे लब मेरे लब पर,
मानो
भंवरा फूल की पंखुड़ियों का रसपान करने में मस्त हो,
ऐसे मशगूल थे
तुम हाँ तुम ही तो थे
अपने प्रेम का मीठा रस
तुम मेरे मुँह में
डालते जा रहे थे,
शहद की तरहं
आँखे बन्द,
मगर फिर भी हम
एक दूसरे के सौंदर्य का
रसपान कर ,
आनंद ले रहे थे
जीवन का
हाँ कल हम जी रहे थे,
पहली बार
खुद में जिंदगी को
महसूस किया
करीब से,
तो पता चला जिंदगी
इतनी खूबसूरत भी
होती है,,

४) मैं ,मेरे
सामने एक दीवार
जिसके उस पार
भी कुछ नहीं दिख रहा
इस पार भी,
सामने
धुंआ धुंआ
शोर की ध्वनि,
मैं, मैं पानी में
डूब रही हूँ,
तरंगें उठ कर
मेरे रग रग को
तरंगायित कर रही है
मेरा अंग अंग रोमांचित
सा महसूस कर रहा है
किसी के आने की
ध्वनि कानों में
गूंज रही है,
मगर
कौन, मुझे नहीं पता
कौन है,

५) काश,
काश तुम तुम न होते
काश मैं मैं न होकर
हम होते तो,
मंज़र कितना सुहाना होता
मगर ये न हो सका,
क्योंकि
तुमने कहा ,
मैं बन्धनों से आज़ाद हूँ
मैने आज़ाद कर दिया
अब उड़ तू
आज़ाद हवा में अपने पंखों
को खोल ,उड़
जब थक जाए
पँख चुरमुरा कर टूटने लगें
सूखे पत्तों की तरहं
होंठ प्यास से भर जाएं
उनपर पापड़ की तरह
पपड़ी जम जाए
जो चरमरा कर
चटनकने लगें
और मेरी याद आये
तो सोचना,
किसी दरख़्त की
छावं में बैठकर,
कि आज़ादी से
क्या पाया तुमने,

६) मैं एक डाल पर
बैठी हूँ
चारों ओर
टुकुर टुकुर
देख रही हूँ
दूर तलक कुछ नहीं
दिखाई दे रहा
मैने उड़ने के लिये
पँख फैलाए,
तभी,
ज़ोर से एक आवाज़ आई
पँख वापस
बन्द हो गये,
कौन था
ये किसका स्वर है
पता नहीं,,

७) वो
नई सुहागिन
लाल जोड़े में
स्नेह स्वप्न में मग्न
सो रही थी
सुनसान काली रात में
मस्त मगन
जैसे कोई
कोमल तरुणी लता लेटी हो,
अलसाई -सी
मदमस्त
नशीले नयनों में
नारीत्व के,
कोमल अहसास की
अंगड़ाई लिये
पड़ी थी,
उसके नेत्र आधे बन्द थे,
शिथिल पत्रांक की गोद में,
नासिका से सांसो की
सुगन्धित,गंगा-सी धवल–
अमृतधारा बह रही थी ,
उसका का आवागमन
रात्रि को महका रहा था,
उसकी उतेजना देख
वो भी मंद मंद
मुस्कुरा रही थी,
सुराही दार गर्दन के ठीक नीचे
स्तनों का उभार,
मानो
दो फलदार पुष्पों का,
दो काले भँवरे
रसपान कर रहे हों,
शर्मोहया की
झीनी- सी
ओढ़नी कि पारदर्शिता
किसी के भी ह्रदय को
विचलित कर दे
लय खाती कमर की
नाभि के ठीक नीचे
अहसास का समुंदर
अपनी उबलती हुई
लहरों की उमंगों से
बेचैन हो रहा था
हिलोरें ले रहा था,
उसकी विलविलाहट
बसन्त से न देखी गई
छोड़ गया था विदेश उसे
अचानक याद हो आई
अपनी प्रिया, संगिनि की,
आख़िर था तो
वो भी एक पुरूष ही,
दौड़ा,
और रुख किया
अपनी प्रिया की तरफ,
उपवन-सर-सरिताओं को
पार करता हुआ,
आ पहुंचा,
कली के पास,

आकर उस नाजुक
कोमल कली को
अपनी अंगुलियों से छुआ,
झंकझोर डाला,
इस पर भी वो जागी नहीं,
निद्रालस में पड़ी,
विशाल नेत्र मूंदे रही,
यौवन की मदिरा पिये,
उसकी नशीली,भंगिमा
उफ़्फ़, अच्छे भले को
मतवाला बना दें,
छूते ही वो अपना
काबू खो बैठा
उसके कोमल कपोलों को
चूम चूम कर मसोस डाला
सुर्ख लाल कर ,
कली चोंक पड़ी,
इतने में भी उसकी कामपिपासा
नहीं बुझी
नीचे और नीचे
सीने के उभारों को
मरोड़कर चूसने लगा,
यौवनता का सारा रस
चूस डाला उसने,
कली भी
यौवनता की नदी बनकर उफनती जा रही थी ,
दोनो ही कामक्रीड़ा में मस्त थे,
बेहोश,
होश से कोसों दूर
मीठी- मीठी पीड़ा
जो आनंद से लबरेज़ थी

हाय रे ओफोओ
उनहूँ ओहोहो
आए हाय रे,का स्वर
सारे वातावरण को
गुंजायमान कर रहा था,
आंनद ही आनन्द
बह रहा था
घण्टों ,
क्रीड़ा के पश्चात
उन्माद और बड़ा,
बढ़ता ही गया
बसन्त का काबू न रहा
अपने जिस्म पर,
मतवाले हाथी की भांति
वो बहक गया,

और फिर तो
बस उसने
अपना कोमल अंग
जो लोहे जैसा
कठोर हो चुका था
डाल दिया,
उस अहसास के समुद्र में
ऊपर नीचे, दाएं बाएं
कुरेदता रहा,छीलता रहा
उसकी दीवारों को
कली चींखती रही,
विलविलाती रही,
वो तो मस्त था
अपने तेज,धारदार,
नुकीले हथियार के साथ
कुरेदने में
अतल गहराई में
उतरता गिरता,
धक्के मार-मार कर
लगा रहा , तब तक
जब तक कि
अपने जुनून को
समुद्र में गिराकर
खाली नहीं कर लिया,
तब चैन की साँस ली,
अधमरा कर दिया था
बेचारी नाजुक कली को,
लफ्ज़ से लफ्ज़
बोल रहे थे
आपस में,
उनकी अपनी ही भाषा थी
इंसानी बोली से जुदा
किच पिच की ध्वनि,

बस फिर क्या
प्रातः की
पहली किरण फूटी ,
पुरवाई बहने लगी
सब देखने लगे,
उषा-चहचहाती चिड़ियां,
जाती हुई रात्रि भी
शरारती हँसी
हँसकर प्रसन्न थी,
उनके मिलन पर,
कली
हड़बड़ाती हुई उठी,
अपनी अस्तव्यस्त
ओढ़नी से
अपने बदन को ढाँक
आँख मूंद बैठ गई
एक सुहागिन
दुल्हन की तरहं,,,,
हाँ सुहागिन तो वो
बरसों से थी
मगर सच्चे रूप में
आज उसने
सुहाग का अर्थ जाना
महसूस किया कि
प्रीत क्या होती है ??

डॉ मीनाक्षी कहकशां

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