डॉ मिनाक्षी कहकशां की कुछ पङ्तियां की चार टुक्रे हिन्दीमें

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१)
सांपो की बस्ती में चलना सम्भल कर
हर इक शख्श यहाँ डसता मचल कर

चूमकर कपोल करता मदहोश तुमको
मारे डंक फिर तेरी जिव्हा कुचल कर

किसी से ना जुर्म उसका तू कह पाए
वास्ते वो जुवां तेरी रखता पकड़ कर

 

बगाबत ना कर पायें कोमल लबों को
कुंडली मार खुद में रखता जकड़ कर

क्रोधी ” कहकशां ” मचा देगी बबंडर
पाताल पहुंचे फिर तन से अकड़ कर
२)
डरके साये में बातें करना कितना मुश्किल है।
मेरा और तुम्हारा मिलना जितना मुश्किल है।

चाँद पे परियाँ होती हैं सुनते थे बचपन में
परियों के पँखों को छूना कितना मुश्किल है।

रहती हैं वो तो सदा ही सागर के दिल में
लहरों को प्यास बुझाना कितना मुश्किल है

पल भर में उसे मिटाकर रख देते हैं लोग
कोख़ में, लक्ष्मी रखना कितना मुश्किल है

खून पसीना एक ,कर देखे वो ये सपना
माटी से,गुल का खिलना कितना मुश्किल है

प्यार हुआ तो सोचा दुनियां पाली हमने
उसे निभाना इस दुनियां में कितना मुश्किल है

सच,तो है रहते हैं एक ही दिल में हम सब
फिरभी अपनी साँसे गिनना कितना मुश्किल है।

३)
देखनी है जिंदगी फ़कीर से पूँछो
होती है भूँख क्या ये ग़रीब से पूँछो

देखा न उसके किसी ने रँग को
रोती हुई जरा उस तस्वीर से पूँछो

दौड़ न सके कभी जिंदगी में जो
बिन पाँव वाले उस लंगीर से पूँछो

होता है दर्द क्या दिल को बांटनेका
जाकर कभी किसी लकीर से पूँछो

मरा बेईलाज जिसका लख्तेज़िगर
दर्द, बेरहम के ज़मीर से पूँछो

पैसा बचाने की हो जद्दोजहद में
दर्द उस “बेचारे” अमीर से पूँछो

छिना जिस तरहं लाल ए कहकशां
रोई आँख की उस तक़दीर से पूँछो ।

४)
हवाओं में मुझे तेरी छुअन महसूस होती है
वफाओं में मुझे तेरी छुअन महसूस होती है

गले मिल जाओ अब हमारी जिंदगी से तुम
दूरियों की तेरी ,मुझे चुभन महसूस होती है

हमारा हाल तो देखो पतझड़ के जैसा है
भरी बरसात में भी जलन महसूस होती है

शोला बनकर धरती जब मेरे पाँव छूती है
भरी गर्मी में भी तो गलन महसूस होती है

विरह में जल रही आँखे तुम आ ही जाओ
हरा सावन भी देखूँ,अगन महसूस होती है

कहीं जलकर ना मर जाये तेरी कहकशां
ले चल अंधेरे में, थकन महसूस होती है ।

डॉ मिनाक्षी कहकशां

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