डॉ मीनाक्षी कहकशां का हिन्दी में पाँच कविताएँ

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

१) आज मैं
सो रही हूँ
मुझे
जगाना मत
संगतराश
तू बरसों से
जगा रहा है
मुझे
ठोंक ठोंक कर
ज़रा सा भी
नहीं सोचा तूने
की चोट लगती है –

 


मेरे तन पर
उससे भी ज्यादा
मन पर
तुझे उससे क्या
लगने दो
होने दो पीड़ा,
हमें क्या
हम तो ठोकेंगे मारेंगे
अपनी
नुकीली छैनी से
छीलेंगे
ऐअहसान
करने वाले
फरिश्ते
पता है तुझे
आज मुझे
नींद
मिल गई है
एक प्यारी सहेली
जो मीठी मीठी
थपकियाँ देकर
मुझे सुला रही है
नहीं पूँछूगी
अब तुझे
नहीं मनाऊँगी
नहीं रोऊँगी
तेरे लिये
तू अपनी दुनिया में
मस्त है ना
रह अपनी दुनिया मे
अब मैं
नींद के साथ रहूँगी
हाँ नींद के साथ
बस नींद
मीठी नींद
सिर्फ नींद ।

२) सुनो
आज बहुत मन है
तुम अपनी
कोमल बाहों का सहारा देकर
मुझे अपने सहारे
बिठाकर
अपनी कोमल अंगुलियों से
मेरा सर सहरा दो
मेरे बालों में अंगुलियों को
फिराते हुए
अपनी गरमाहट भरी
गुनगुनी साँसों से मेरे माथे को
चुम लो
बरसों से प्यासी आत्मा को
ठंडक पहुंचादो
अपनी कोमल हाथों से
एक प्याली
चाय पिलादो
मेरी तबियत सही नहीं
बहुत पीड़ा है मुझे
बाँट लो मेरा दर्द
मैं तुमसे बात भी नहीं कर पा रही
संभालो मुझे
अपनी मरमरी बाहों में
रोक लो मुझे
टूट कर बहने से,
हाँ रोक लो
समा लो अपने में
समा लो,,

३) एक थी शीतल
बहुत प्यारी कोमलता से भरपूर,
अल्हड़ जवान होती हुई
लडक़ी थी वो

स्पर्श था
कठोर,कट्टरता और क्रूरता
भरी पड़ी थी
उसके ह्रदय में
दोष नहीं था उसका इसमें
जरा-सा भी
क्योंकि उसे बचपन में ही
चुरा लिया था।
आतंकवादियों ने
जेहाद के नाम पर
कर दिया था, कुर्वान
उस अबोध नन्हें दुदमुहे बच्चे को

रात दिन उसे गोलियां चलाना सिखाते
एक दूसरे को
मारना काटना सिखाते
हिन्दू मुस्लिम में भेद बतला कर,
उन्हें आपसी दुश्मन बनाते
वो नन्हा क्या जाने
इन बातों को

फिर एक दिन
सहसा उसका सामना हुआ
एक लड़की से
स्पर्श के हाथों में
रिवॉल्वर देख वो डर गई
कांप गई उसकी रूह
सारा बदन पसीने से लथपथ था
झीनी पोशाक में
उसका मरमरी गोरा बदन
चाँदनी जैसे दमक रहा था

उस बर्फ जैसे,
रुई के गोलों सा दूधिया चेहरे पर जैसे ही स्पर्श की नज़र पड़ी
उसके अंदर का इंसानी अहसास जाग गया

आखिर था तो वो
एक कोमल ह्र्दयी
बालक,
जिसे उन निर्मम हत्यारों ने
कठोर पत्थर जैसे
बना दिया था
डरते डरते
कंपकपाते
हाथों से उसने शीतल को स्पर्श किया
अचानक बिजली-सी कौंध गई उसके तन-मन में
हाँ चौक गये दोनों
ये क्या हुआ शीतल के ठंडक को छू स्पर्श के भीतर तक शीतलता फैल गई
फिर क्या था
शीतल स्पर्श एक दूसरे में
मिलकर पूण हो गये
नहीं भूल सकता
वो शीतल का ये अहसान
तब से आज तक
स्पर्श शीतलता फैला रहा है
बम और गोलियों
की बजाये
मिलन के गीत
मल्हार के तराने
महका रहे हैं
हाँ मिलन
सिर्फ और सिर्फ मिलन
ही बचा है
आओ हम सब में
एक शीतल और एक स्पर्श
विराजमान है
उसे जगाएं
दें सन्देश
मिलन का,
सिर्फ़ मिलन का,,

४) कवर पेज
एक किताब का!
जिसमें दो बच्चियों की
तस्वीर है,
सुकोमल
नाजुक और मासूम
मगर !
उनकी आँखों में मासूमियत
मरी पड़ी है
एक बच्ची पन्द्रह वर्ष के आसपास,
तो दूसरी बच्ची
तीन साल की
नन्ही- सी गुड़िया!
जिसको बड़ी बच्ची ने
अपनी गोद में
कमर के सहारे ले रखा है
अपने जिस्म को कपड़े से
ढक रखा है,
अर्धनग्न अवस्था में
बड़ी बच्ची सामने की ओर
देख रही है,
भविष्य के नाम पर
सिर्फ शून्य ही है
उसके चेहरे पर
उदासीनता की झलक
स्पष्ट दिखाई दे रही है,
छोटी वाली बच्ची का चेहरा
थोड़ा सूजा हुआ सा,
आँखें फ़टी फ़टी – सी
और वो बहुत ज्यादा
ख़ौफ़ज़दा हैं!
शायद वो अभी मासूम है
इसलिए,
सब कुछ देखकर
उसे समझने की
जद्दोजहद में है
मगर!
बड़ी बच्ची तो शायद
समय से पहले ही
बड़ी हो गई हो,
उसकी मासूमियत,
उसकी चंचलता,
उसकी अठखेलियाँ,
सब उदासीनता में
परिवर्तित हो गई हैं
क्योंकि
जीवन में वो,
वो सब देख चुकी है,
जो बढ़ती उम्र का हिस्सा है
मानो !
उसके साथ बहुत कुछ
ऐसा बीत चुका है
जो हमारे समाज में हर पल
आए दिन घट रहा है,
बच्चियों के चेहरे से कोमलता छिन रही है,
मासूम कलियों को
कुचल कर अपनी हवश का शिकार बना,
मौत के मुँह में धकेला जा रहा है
उनके नन्हे – नन्हे हाथों से
बचपन छीन,
कलम-किताबें और
खेल खिलौने फेंक,
मजबूर करा जा रहा है
उन्हें वक़्त से पहले
बढ़ा होने पर

बड़ी वाली के चेहरे को
देख लगता है,
वो शिकार हो चुकी है
“आसिफा”
जैसी किसी दुर्घटना की,
बस किसी तरहं
जान बच गई है उसकी,
एक बार नहीं कई कई बार!

उसका बुझा हुआ चेहरा
साफ़ दर्शा रहा है
उसकी ख़ौफ़ज़दा दास्तान,
जो उसकी शक्ल पर
दहशत लकीरें बन कर
स्थाई रूप मे ढल गई है

अपनी छोटी सी बच्ची को
पालने के लिये
क्या क्या यत्न नहीं करती वो,
एक बार किसी दरिंदे ने
उसकी मासूमियत को
तार- तार कर,
डाल दिया
उसकी कोख़ में
अपनी हैवानियत का ज़हर
घर वालों ने भी
उसे दुत्कार कर निकाल दिया !
नहीं दी पनाह,

बेचारी,रोती, विलखती
सड़को पर भीख माँग कर
अपनी कोख में
पल रहे उस दरिंदे के
जहर को,जो अब
उसकी जान बन चुका है,
कैसे मरने देती
आखिर वो अब माँ है
किसी तरह राम राम करते
बीत गये नो माह,

एक दिन क्या देखते हैं
सड़क पर चारों ओर भीड़
लगी पड़ी है
और बेचारी दर्द से कराहती
चिल्ला रही है
इतनी बड़ी भीड़ में
एक भी इंसान नहीं मिला
उसे जो सहारा देता
दया उपजती किसी के ह्रदय में,
दे डाला उसने सड़क पर
हज़ारों लोगों के सामने
उस नन्हीं परी को जन्म
और चल दी
खून से लथपथ
अपने ज़िगर के टुकड़े को अपनी गोद में उठा बहराती
हुई,,
ये हैं हमारे देश के पुरूष
भारतीय पुरुष!

उधर दूसरी तरफ चींखती चिल्लाती,दर्द से कराहती
वो छोटी सी,
कच्ची उम्र की माँ
हाँ, भारतीय माँ
जिसने किसी खूनी वहशी
की गन्दगी को भी,
निखारकर,
कोमल कली के रूप में अपनी कोख़ में विकसित किया ,
अब देख रही है
सूनी आँखों से
सामने की ओर
तलाश रही है अपने
अंधकारमय भविष्य को
जिसके नाम पर
सिर्फ शून्य है ।

५) मैं बिस्तर पर
सामने एक लकड़ी का तख्ता रखा है
ऊपर एक घड़ी ,
घड़ी के ठीक ऊपर
नाक की सीध में
उसकी
तसवीर
जिसे देखते ही
मेरे रोंगटे
खड़े हो जाते हैं
सिर्फ एक पल को,
तदुपरांत
मन में उसकी खुशबू,
छुअन का अहसास
साँसों को ऊर्जा
दे,आगे बढ़ने की
प्रेरणा देकर
चला जाता है
अपनी दुनियां में
न जाने कौन सी??

डॉ मीनाक्षी कहकशां

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