हिन्दी कविताः मुझे याद हैं

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विजय पंडित

वो लम्हे
आते जाते हर सफर में
होती थी जब
किताब सबके हाथ में
सच्चे मित्र जैसे
हर पल
साथ निभाती पुस्तके
राह दिखाती..
पुस्तको में
वो खतों का
आदान प्रदान.. –

 


पढतें पढतें
सो जाते जब
सपनों में खो जाते कब
पता ही नही चलता..
पर अब
हम बड़े हो गये
पुस्तके दूर
गेजेट्स में चहुँ ओर
खो गये
और हर हाथ
मोबाइल आ गये..
तरक्की की आंधी
में आईये हम बचाए ..
रखे कुछ
परम्परा
महसूस करें कागजों की महक
एक बार फिर
करें पुस्तको से प्रेम ..
पढ़े और पढाये
उपहार में दें
पुस्तके
वहीँ पुरानी परंपरा ..
आगे बढ़ाएं
पुस्तको से प्रेम जगायें
आइये एक बार
पुस्तको की दुनियां
में खो जाएँ…

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