डॉ मीनाक्षी कहकशां का हिन्दी कविताएँ

 

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डॉ मीनाक्षी कहकशां

आज
फिर वो फरिश्ता
चुपचाप बैठ गया
मेरे सामने,
निहारता रहा मुझे
मैं सो रही थी
पर कैसे सोती
जैसे चांदनी रात में
सूरज चमक उठा हो,
ऐसे ही उसकी
मुहब्बत भरी किरणें
मेरी पलकों पे पड़ी
और मैं चुँधिया कर
जाग गई,–

 


ज्यों ही मैने अँगड़ाई ली
वो झट से,
मेरे बराबर में
मैंने उठना चाह
मन से नहीं सिर्फ़ तन से,
मगर
उठ न सकी
इस बार जैसे वो
ज़िद पकड़ कर आया था
मेरी उंगलियों को
अपनी उंगलियों में फंसाके,
कोमलता से जकड़ लिया
वो मेरे ऊपर,
पाँव को मेरे पाँव में फंसा
आतुर हो गया
एक मीठे से बन्धन में
बांधने के लिये।
कुछ ही पलों में उसने
उन जंजीरों को खोला
और मुझे जकड़कर
बाँध लिया,
अपने इश्क की जंजीरों में
मेरे अंगों को चूमना
शुरू किया
साँसों उतार चढ़ाव
अपनी खुशबू बिखेर
वातावरण को
महकाता हुआ
चार चाँद लगाकर
चुपचाप खड़ा मन्द मन्द
मुस्कुरा रहा था
मैं रूहानी अहसास से सराबोर हो डूबती चली गई
मदहोश होती चली गई
वो ऊपर से नीचे की ओर बढ़ता गया।
वस्त्रों की दीवार ढहने लगी
रूहें आपस में
बात करने लगीं
घोर सन्नाटे को हमारी साँसों की ध्वनि
जैसे चीरने लगी हो,
वैसे ही मेरे क्षीण बदन को
चीरता हुआ वो
मुझमें समाता चला गया
एक तीव्र अनभूति,
मीठे अहसास,
की चादर में लिपटा
वो दर्द मुझे बेहोश
किये जा रहा था
बदन चिपचिपा कर
गीले तर हालत में
मगर
होश नहीं था
न उसे न मुझे
और इस तरह दो बदन
एक प्राण बन गये
कहकशां ने विजय पाली
अपनी खुशियों पर
अपनी जिंदगी पर,,,

डॉ मीनाक्षी कहकशां

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