पूनम पंडित की कुछ पङ्तियाँ

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पूनम पंडित

अचानक हो रहा है कुछ नया सा एहसास।
मचल रहे हैं अरमान, जग रहे हैं सुप्त प्राण।

मन करता है, मैं भी मनाऊँ त्यौहार।
बाँधू राखी, भाई की कलाई पर।
लगाऊँ मंगल टीका, उतारूं नज़र।
तीज मनाऊँ, जाऊँ बाबुल के घर।

लौट जाऊँ , बचपन के आँगन में।
पेड़ों पर झूले डालूँ, झूलूँ सावन में।
विचरूँ उन्मुक्त बाबुल के कानन में।
बच्चों संग अलमस्त खेलूँ आँगन में।

 

उतार फैंकूँ हर चिंता, जिम्मेदारी।
सजा लूँ, नव पथ की नई सवारी।
लगा लूँ पंख आशा के,चढ़ जाऊँ रथ में।
उड़ चलूँ बेफिक्र, उन्मुक्त नभ में।

”मगर, अचानक रुक जाता है कल्पना का रथ।
सामने दिखाई देता है, संघर्षमय कर्मपथ।
और चल देता है मन कर्मपथ पर।
मचलते हुये अरमानों को समेटकर।”

– पूनम पंडित
(ग्रीन केयर सोसाइटी)
मेरठ, यु पी, भारत।

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