श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना के छे कविताएँ

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कुमारी अर्चना

1) भोजपुरी कविता
लाल लाल टमाटर देखs के
सबके जीव ललचाय हो गोरी
सबके जीव ललचाय

लाल टमाटर खाई के गोरी
लाल गाल दिखलाय हो गोरी
लाल गाल दिखलाय

पड़ल मँहगाई के अइसन मार
टमाटर गईल सौ रूपिया के पार
बिन गर्मी के पारा चढ़ल
सैतालिस के पार उ बढ़ल

 

कइसे अब देखलाई आपन
पिचकल पिचकल गाल हो गोरी
पिचकल पिचकल गाल

अब का होइ देस के हाल
अइसन आइल बा अच्छा साल
जनता अब त भइल बेहाल
फिर से देखी अगिला साल

रसोई घर से सरपट ई गायब बा
तरकारी बनी कइसे झालदार हो गोरी
तरकारी कइसे बनी झलादार

बताई ए मोदी जी जनता के रखवार
कइसन बा राउर ई सरकार !

2) “धँध सा हो रहा”
खुला आकाश भी
भरा भरा सा लग रहा
फिर मेरा जी क्यों हलका होता जा
जो कल तक अपने भार से
मेरा वजूद को ही मिटा रहा था
अब मुझे खुले में साँसे भरने को
पूरा आकाश दे रहा!

छूटा गया है वो घना कोहरा
गुजर चुका वो बिगड़ा वक्त
आगे सुनहारा कल है
मेरे इंतजार में
और मैं उसके!

अखिर कब तक
उस धुँध के साथ रहूँ
जो एक ना एक दिन
मुझे छोड़ चला जाएगा ही
जैसे वो चला गया!

3) “श्रद्धेय है हम”
श्रद्धेय है हम
ओओ हमे पूजो
चंदन,टीका लगाओ
अक्षत भी छिड़को
मंदिर में बिठाओ
देवी रूप में हम
कुवारी कन्याएं है
तो कहीं जिंदा देवी है
महाकाली का स्वरूपा!

धर्म के नाम पर हमे देवी के
येल्लमा मंदिर में माध पूर्णिमाँ
जिसे”रण्डी पूर्णिमा” भी कहा जाता
बलि का बकरा बनाया जाता
आदिवासी नवयुवतीयों का मेला होता
जहाँ भक्तों का उनके देह से खेला होता
शादी की सारी रस्मों रिवाजों के साथ
हमारा नग्न जूलूस निकाला जाता
फिर दीक्षित करके मंदिर और पुजारियों की
जीवंत संम्पत्ति बना दिया जाता!

हमारा विवाह मंदिर से होता
हम देव की पत्नी या दासी कहलाती
पहले हमारा कार्य संगीत,नृत्य और
धर्म की रक्षा करना था
बाद पुजारियों और मेहमानों
को यौन तृप्ती करवाना था!

ऐसा ही मान्यता की
देवदासी के प्रणय कीड़ा करने से
गाँव में सुख शांति बनी रहेगी
प्रजा पर विपदा नहीं आएगी
चाहे हमारा बच्पन खो जाए
यौवन क्यों ना तबाह हो जाए!

देवदासी शब्द का प्रथम प्रयोग
कौटिल्य के “अर्थशास्त्र” से
कालिदास के मेघदूतम् तक मिलता
आधुनिक साहित्यिक विधाओं में
हमारा दर्द परोसा जाता फिर भी हम
देवदासी की देवदासी रह जाती!

उठती रहती सदा ही अवाजें
पर कोई सुनता ही नहीं है
अखबारों का बांसी खबरों जैसी
धर्म के नाम पर कुप्रथा को श्रेय दे रहे
जिससे अपना वोट बैंक ना कम हो!

मंदिरो को मिलने वाला सामंती
सरंक्षण धीरे धीरे समाप्त होने पर
बाजारवादी पूँजीवादी व्यवस्था ने हमे
जिस्म की मंडी का माल बना दिया
या फिर भिक्षावृत्ति करने को विवश!

4) “इच्छाशेष है”
बह चले मेरे भाव
भावनाओं के प्रवाह में
अब ना रूकेगें
जाये तू जिस ओर
जाउँगी मैं उसी छोर!

तेरे पदचिह्नों को ढूंढ़ती
अपना रस्ता बनाऊँगी
सब पिछल्लगू कहेंगे
तो कहने दो ना
हँसते तो हँसने दो!

तू चलेगा तो
मैं भी चलूँगी
तू दौड़गा तो
मैं भी भागूँगी
तू रूकोंगे जहाँ
मेरे मंजिल वहाँ
पर परछाई को कब
कोई पकड़ पाया है!

मेरे अंर्तमन में दबी
तुझे पाने की इच्छा शेष है
जिसे पाने के लिए
मैं और मेरा मन व्याकूल है!

क्यों दिल से तुझे चाहने की
आज भी इच्छाशेष है
भले तू तन से किसी और का
बन चुका है फिर भी तुझे
अपना बनना की इच्छाशेष है !

5) “पंचाली का ये कैसा कौमर्य”
क्यों पाँच पतियों की होकर भी
द्रौपदी नारी नहीं कन्या ही थी
हिंदू धर्मेग्रंथों पर बड़ा सवाल उठाती
जब एक स्त्री एक पुरूष से संबंध बना
कौमर्य खो देती है
फिर कैसे द्रौपदी कौमर्य भंग ना हुआ!

श्लोक में इन पात्रों अहिल्या,द्रोपदी,कुन्ती,तारा,मन्दोदरी तथा
पंचकन्या स्वरानित्यम महापातक नाशक कहा गया
प्रात:काल इनका नाम स्मरण करना चाहिए!

अर्जन ने मछली की आँख में निशान साधकर
स्वयंवर तो जीत लिया
पर द्रोपदी का दिल ना जीत सके
कुंती ने बिन देखे पाँच पाण्डवों में
द्रौपदी को वस्तु समझ बाँट दी
पर पाँचों के ह्रदय में द्रोपदी ना समां सकी
विवाह उपरांत पंचाली कहलायी
पर कभी सम्मान ना पा सकी
आज भी खिल्ली उड़ाई जाती है
स्वच्छंद औरतों को द्रोपदी कहकर!

व्यासजी ने दिया था आशीर्वाद
द्रौपदी एक एक वर्ष सभी पाण्डवों के साथ रहेंगे
जब वह एक भाई से संबंध बना
जब दूसरे भाई के पास जाएगी
उसका कौमर्य पुन: वापस लौट आएगा
अन्य चार भाई नज़र उठा कर तब
पंचाली को नहीं देखेंगे
पर ये शर्त अर्जुन को रास न आई
वो पति रूप में सदा असहज बने रहे!

सभी अपने काम वासना को
नियंत्रित ना कर सके
सबने अलग अलग स्त्रियों से संबंध बनाए
धर्मराज युधिष्ठिर ने देविका से
बलशाली भीम हिडिम्बा से
धनुर्धर अर्जन ने सुभद्रा,उलपी और चित्रांगदा से
अश्विनी जुड़वा पुत्रों नकुल ने जरासंध की पुत्री से
और सहदेव ने विजया से
दौपदी पांच पतियोंवाली होकर
ताउम्र प्रेम के लिए तरसती रही
सबकी शारीरिक इच्छाएं पूरी कर भी
स्वंय मांनसिक रूप सेअतृप्त रही!

ये द्रौपदी का कैसा शिव का वरदान था
एक पुरूष में सारी गुण ना हो सकते थे
तो पाँच पति रूप में पाण्डव दे डालें
इससे तो भली एक समान्य नारी है
जो एक पतिव्रधारी रहकर भी
जीवन सारे आनंद को पाती है!

6) “मेरा प्यार”
मेरा प्यार तेरे लिए..
कितना है मैं कह नहीं सकती
बस इतना जानती हूँ
दो शरीर का रूप लेकर
भी एकाकार है!

तुम मुझमें और मैं तुममें
ईश्वर और भक्त बनके!
मेरा अस्तित्व तुम बिन शुन्य है
और तुम्हारा भी!

मेरा प्यार तेरे लिए है
और सदा ही रहेगा..
बादल सा उच्चश्रृख है प्यार
सागर सा गहरा है प्यार
समुद्र सा लहराता है प्यार
झरने सा शीतला है प्यार
पवन सा उड़ता है प्यार
पर्वत सा द्धढ़ है प्यार
हिमालय सा ऊँचा है प्यार
जमीन सा समतल है प्यार
नदी सा निर्मल है प्यार
कलियों सा खिलता है प्यार
फूलों सा महकता है प्यार
पत्तों सा हरा है प्यार
पतझड़ में ना झड़ता है प्यार
हर मौसम में सुहाना है प्यार
इंद्रधनुष सा संतरंगा है प्यार!

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार
26/4/18
kumariarchanaka3@gmail.com

 

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