श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना का दो कविता

Kumari, Archana, श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना, pallawa, पल्लव

श्रृंगार कवयित्री कुमारी अर्चना

१) “अलबेली चली अलबेला ढूढ़ने”
अलबेली की जब शादी की
उम्र हो आई तो / उसको अलबेला ढूढ़ने की सूझी
सोची चुटकी बजा कर / इस पहली को सुलझा दूँगी !
लव और अरैंज के विवाद में उलझी
पर किसको पता था वो
कई वर्षों के वनवास में फंसी !

कभी कॉलेज तो
तो कभी लाइब्रेरी तो
कभी केन्टीन तो
तो कभी पार्क में
कभी कोचिंग में
तो कभी पार्टियों में
फिर ना मिला वे छबिला !

 

अखबारों में शादी की एंड टंगवाई
सोशल साइटों के चक्कर लगाई
कभी फेसबुक पर फेस मिलाई
तो कभी वाट्अप पर चट्टर पट्टर की
तो कभी इस्ट्राग्राम इंसर्ट किया
तो कभी लाइन पर जाकर लाइक की
कभी विवर में विडियो कोलिंग मिलाई
तो कभी ट्यूटर पर ट्यूट किया
फिर ना मिला वो दिलवाला!

तो शादी डाटॉकॉम पर बायोडाटा डाला
तो कभी जीवनसाथी डॉटकॉम में सर्च मारा
सब कर देखा कुछ ना हुआ
अब तो लगता है आँख मार कर
किसी लल्लू को ही पटाना होगा
उसको ही अपना सजना बनाना होगा !
26/4/18

२) “आदमी की नगाह में औरत”
आदमी की निगाह में औरत क्या है
कैसी है और क्यों है
ये दृष्टिकोण जाने से पहले
ये जाना भी बहुत जरूरी है कि
आदमी कब धरती पर आया
आदमी का अपने जैसे आदमी से
शक्ल से भित्र है या स्वाभाव में भी!

जब एक आदमी दूसरे आदमी से
औरत के प्रति विचार,सोच और
व्यवहार में अलग अलग है तो
औरत की परिभाषा करना भी
यह व्यक्तिगत स्वभाव,शिक्षा,संस्कार और हालातों पर निर्भर करता है!

पश्चिमी सभ्यता ऐडम और एम्बेला
हिंदू धर्म पुराण मनु और सतरूपा
और इस्लाम में आदम और हुवा से
पहला मानव उत्पति मानता है!

आदमी की निगाह में
औरत केवल देह है
औरत केवल वस्तु है
जिसे उसकी मर्जी से
क्रय व विक्रय की जाती
जैसे कि वस्तुओ को!

आदमी की निगाह में
औरत जीवित संपत्ति है
जमीन,मकान व धन जैसी
औरत बच्चा पैदा करने की मशीन है
जो जब तक टूटती नहीं
कभी थकती नहीं है!

औरत घर की सुसज्जा है सोफा,पलंग,टेबल जैसी
बाहरी लोगों के मनलुभावने के लिए!

नाजुक सी छुईमुई,कोमल कली है
जो केवल उसके लिए भोग के ही
लिए बनी है
जैसे फूल,फल व इत्र आदि!

औरत माँ, प्रेमिका,पत्नी,बेटी भी है
औरत देवी दुर्गा,काली,लक्ष्मी भी है
औरत उसकी जीवन संगनी भी है
जो सुख दुख में साथ रहती है
उसके परिवार और बच्चों की
सेवा से सिंचने वाली मालिन है
उसके घर की नींव है जो अपने
से विश्वास मजबूती देती है!

आदमी की नजर में औरत
आदमी जैसी ही है
हँसती,बोली,गाती और खाती पीती
मानव है
पेट की रोजी-रोटी जोड़ने वाली सहयोगनी भी है!

आदमी की निगाह में औरत
अर्दनारीश्वर शिव व शक्ति रूपा है!

आदमी की निगाह जैसी होगी
औरत उसको सदा उसी
रूपी में नज़र आएगी
मन की नज़र साफ़ होगी तो पवित्र,शांत,सौम्य,संस्कारी,ममतामयी
और खराब होगी तो चरित्रहीन,कुलटा,माया,
कुलनाशनी नज़र आएगी!

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार
मौलिक रचना
26/4/18
kumariarchanaka3@gmail.com

 

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