कुमारी अर्चना की पाँच हिन्दी कविताएँ

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कुमारी अर्चना

१) “कौन पद्मावती”
इतिहास के पन्ने पर
जिसका केवल जिक्र भर ही है
कोई रोमानी कहानी सा लगता
आलाऊद्दीन ने पद्मावती के हुस्न के
जब चर्चे सुनके बाबरा सा हुआ
दर्पण में रूप के दर्शन कर
चितौड़ पर आक्रमण किया
रत्नसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ
पद्मवती ने सतित्व की रक्षा हेतु
जौहर किया और अन्य हरम़ की स्त्रीयों को–
अग्नीकुंड में काया को भष्माभूत करवाया
एक मुठ्ठी केवल राख आलाउद्दीन पाया–

 


दूसरी तरफ देखा जाए तो लड़ने के बजाय
स्वंय आत्महत्या की और बाकियों को भी उकसाया!
कुछ लोगों ने पद्मावती को भारत माता से तुलना कर शीर्ष पर बिठाया
उनको ये पता नहीं भारत कब देश बना
भारत माता के नारे देशभक्तों ने जुबाँ से गुनगुनाये!
इतिहास तो रज़िया सुल्तान का है
जिसने सत्ता प्राप्ती के लिए तलवार चमकाई!
इतिहास तो लक्ष्मी बाई का
जिसने मर्दानी बनकर
अंग्रेजो के दाँत खट्टे कर दिए!
सरोजनी,ऐनी व मैडम भीकाजी कामा और अनेको वीरागंनाओ की है
जिन्होनें राष्ट्रीय आंदोलन में कमाल दिखलाये!
इतिहास इंदिरा गाँधी का है जिसने शक्ति बनके
पाकिस्तानी सैना को धूल चटाया!
बाजीराव की मस्तानी पर जब
बाजीराव मस्तानी फिल्म बनती
तो बाजीराव का गाथा दिखती
मराठों का इतिहास में केवल शिवाजी लिखा है!
इतिहास पद्मवती का चलचित्र
बनकर फिर से एक बार सामने आया है
नचनिया के रूप में जब भंसाली ने दिखाया है
राजपूतना के लहू में लहू नहीं क्रोद्ध दौड़ा
जगह जगह पोस्टर और उसके पुलते जलाये
पर जबर्दस्त पब्लिसिटि उल्टे
इसको मिली!
ये संतोषी माँ और शनि देव के नाम से
चलते सिरियल है जो हर घर में
जय जय संतोषी माँ जय जय माँ के नारे बनके गुँजते
हर मंदिर में शनिदेव की एक मूर्ति बनती
अपने कर्मो का दंड पाने के लिए सजय रहो
पाप मिटाने को और कर्मकांड बढ़े
मिडिया की बनाये ये देवी देवता है!
कभी तो सत्य का आइना दिखाते
तो कभी इतिहास को छेड़छाड़ कर
समाज को बँटने और अव्यवस्था फैलाते
वाहवाही और खूब सारा धन बटोरते
विवाद और हंगामे के बाद सब भूल जाते!

२) ‘मैं बिखरे रिश्तों को’
मैं बिखरे रिश्तों को
हाथों की अंजूरी में
बटोर लेना चाहती हूँ
जैसे की मोती हो!

मैं उलझे रिश्तों की डोर को
धागों जैसी सुलझाना चाहती हूँ
जिससे रिश्तो की डोर
अन्नत आकाश छू सके!

मैं रिश्तों के दरार को
विश्वास की सीमेंट से
भर देना चाहती हूँ
कभी विलग ना हो!

मैं टूटते रिश्तों को
टूटे बरतनों जैसी
प्यार के फेबिकॉल से
चिपका देना चाहती हूँ
कभी उखड़े नहीं अपनी जडों से!

मैं जिन्दगी में आने वाले
अजनबियों से भी रिश्ता
बना लेना चाहती हूँ
कुटुबों की संख्या में
नित बढ़ोत्ररी हो!

मैं जीवन में सदा के लिए
छोड़ दिए रिश्तों का
इश्योरेंन्स करवा देना चाहती हूँ
ताकि वो जीवन में और
जीवन के बाद भी सदा साथ रहे!

रिश्ते डेबिड कार्ड जैसे है
जिन्हें मैं हर पल संभाल कर
पास रखना चाहती हूँ
जब जहां चाहो वहाँ भंगा लो
नजर से दूर फिर भी पास
किसी भी समय पे!

३) “प्यारी यादों का कोष”
मुझे प्यार चाहिए था
उसे दौलत
उसे खुशियाँ मिली
मुझे ग़म
उसे सब मिला
मुझे कम मिला
वो मंडी में बिक गया
मुझे मुफ्त का खरीदार न मिला
उसे शौहरत मिली
मुझे बदनामी के सिवा कुछ नहीं
वो डबल हो गया
मैं सिंगल रह गई
उसकी गाड़ी एक्सप्रेस हो गई
मेरी मालगाड़ी बन गई
उसके दोनों हाथों में लड्डू है
मेरी झोली खाली रह गई
वो बड़ा आदमी बन गया
मैं बेकार आदमी बन गई
वो हँस रहा मुझ पर
मैं रो रही उस पर
उसके पास सब कुछ है
फिर भी प्यार का कंगाल है
मेरे पास कुछ नहीं फिर भी
उसकी प्यारी यादों का कोष है!

४) “आर्दश पिता”
पिता….
घर का बगीया का वो माली है
जो अपने सभी पौधों को
एक बराबर समझता है
फूलों की तरह सहेजता व सवाँरता
अपने खूऩ पसीने की कमाई से
सींच-सींच कर बड़ा करता
अपनी घर की प्रथम पाठशाला में
जीवन जीने का सलीका सिखलाता
मेहनत का फल सदा मीठा होता
निराश न होना कठिन वक्त पे
सदा ही आशा की राह दिखाता!

मेरे बच्पन में पिता का साथ न मिला
माँ की संध्या में बच्पन बीता
पिता का नाम तो दाखिले पर मिला
पर हाथ पकड़कर ले जानेवाला
पिता की वो अँगुलियाँ न मिली
जूता व मौजा को पहनाने वाले
कमीज की टाई ठीक करने वाले
वो स्नेहल भरे हाथ ना मिले
सुबह शाम साथ पढ़ाने वाले
स्कूल की कार्यक्रम में जाने वाले
साथ लुकाछिपी खेलने वाले
वो पिता नहीं मिले जो
हम भाई बहन को चाहिए थे!
न स्कूल की वापसी पर
बसता ढोती माँ
आते जाते नन्हों की पीठ पर
भारी बसता सदा रहा
पिता सदा बाहर ही रहे
जब घर में भी रहे तो कटे कटे से रहे
विचारों का सही न तालमेल बना
न हमारा परिवार कभी पूरा हुआ!

जिंदगी संधर्ष करने का सबक भी
नन्हें कदम की जगह मजबूत कदमों ने ली
कॉलेज व बाद कोचिंग कहाँ जाना का
निर्णय हमनें खुद ही लिए
घर के बाहर की दुनिया खुद देखी
पर कमी हमेशा से रही उस
“आर्दश पिता” की रही!

जो कदम कदम पर साथ दें
भटके गर बच्चा तो सही राह दिखाये
समय पर बच्चों का जीवन सवार दें
पिता का दायित्वों को पूरा कर
केवल शिक्षा दे देना ही काफी नहीं
कौन शिक्षा दीक्षा उसे अंधेरे से
उज्जवल भविष्य की ओर ले जाएगी
ये भी परहेदार की तरह देखना काम है
बच्चों का योग्य समय पर विवाह करना व उनके–
संतानो के लिए कुछ उत्तदायिव होते
उनको अपने आर्थिक संसाधन पर निर्भर तो नहीं
आत्मनिर्भर बनाने हर संभव सहायता करें
इसलिए कहा जाता है पिता घर का पिल्लर स्तंभ है
जो घर को विभिन्न आपदाओं व संकट से बचाता है!

५) “मैं उस पगला लड़के को ढूढ़ती हूँ”.
मैं उस पगला लड़के को ढूढ़ती हूँ
जो मेरे हुस्न का दिवाना हो
रात दिन मेरा पीछे पड़ा हो
सोते जागते मेरे सपनों में खड़ा हो!

मैं उस पगला का प्यार चाहती हूँ
जिसके दिल पे सिर्फ मेरा डेरा हो
उसके धोंसले पर मेरा बसेरा हो!

मैं उस पगला लड़के का वफ़ा चाहती हूँ
जो मेरे बेवफ़ाई करने पर भी
जहान में मेरी रूसवाई न करे!

मैं उस पगला के साथ चाहती हूँ
जो मेरे मरने के बाद भी साथ न छोड़े
साया बनकर मेरी रूह के साथ चले!

मैं उस पगला लड़के को ढूढ़ती हूँ
जिसके प्यार में मैं भी पागल हो जाऊँ
फिर हम दोनो पागल प्रेमी साथ जिये!

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार
kumariarchana720.ka@gmail.com
30/11/17

 

2 thoughts on “कुमारी अर्चना की पाँच हिन्दी कविताएँ

  1. बकवास भी छाप देती है ये “पल्लव”???
    ताज्जुब है???



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