कुमारी अर्चनाके हिन्दी तीन कविताएँ

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कुमरी अर्चना

१) “घर घर शौचालय हो जाये तो”
जॉनी ने कहा अपने मालिक से
मैं टहलने के लिए जा रहा हूँ
इधर उधर चलते चलते
सेर भी हो जाएगी
मैं हलका भी हो जाऊँगा!

तुम भी तो पहले मेरे जैसे
घर से कोसों दूर दूर
जाया करते थे टट्टी करने के लिए !

सेर कर अपने स्वास्थ के साथ
दोस्तों से गप्पे मारा कर
मन का बौझ भी उतारते थे
पर अब तुम दो कमरे के एक कोने में–

 


पड़े पड़े रहते हो
वही खाते वही पीते हो
वही बगल बने शौचालय में
टट्टी लगने पे जाते हो!

रात दिन सोचते सोचते तनाव से
डिप्रेशन में चले जाते हो
मोटे और भद्दे तक बन जाते हो!

तुम लोग तो शहर की सफाई का
बड़ा ध्याय रखते हो ना
साथ अपने स्वास्थ का भी
वही हजारों करोड़ों टन
कुड़ा कचरा फैला कर
सलम क्षेत्र भी तुमही बसाते हो
जहाँ इन्सान जानवरों जैसे रहते है!

नदी नालों को प्लास्टिक से
बंद कर देते हो तुम
उन्हें फिर से कोई दुसरा इन्सान
पेट की भूख मिटाने के लिए
अपने नंगे हाथों से साफ करता है!

तुम शहर वाले खुद को सभ्य कहते हो
दूसरे इन्सानों को इन्सान नहीं
मशीन समझ उपयोग करते हो!

मानव होकर भी अमानवीय है व्यवहार तुम्हारा!
ह्रदय रखकर भी ह्रदयविहीन क्यों हो तुम?
इससे बढ़िया तो गाँव है
जहाँ बातचीत कर मन लगाने वाले
दो चार लोंग मिल ही जाते है
चारों ओर हरियाली ही हरियाली
और जंगल व परती जमीन
शौचालय बन जाती है!

पर अब गाँव में भी शौचालय
सरकारी योजना के तहत
धीरे धीरे बनने लगे है
फिर क्या गाँव भी
शहरों जैसे हो जाएगें
फिर मैं कहाँ हलका होने जाऊँगा
फिलहाल मैं टहलने जा रहा हूँ
क्या तुम चलोगें मेरे संग टट्टी के लिए…
टहलने से स्वास्थ अच्छा रहता है
हाँ जॉनी,रूको मैं भी चलता हूँ
प्रकृति की ओर!

२) “मैं दीमक हूँ”
हाँ में दीमक हूँ
घर दिवारों पर
खिड़कियों पर
किताबों में
पुरानी समानों पर
मिट्टी के अन्दर
अपना रैनबसरे बना लेती हूँ
धीरे धीरे फैलती जाती हूँ
जैसे बरगद की लटायें हो!

मैं कहीं भी जाउँ
अपना स्थान घेर लेती हूँ
या यूँ कहे एक सुरक्षित दायरा
बना लेती हूँ
मैं स्त्री नहीं हूँ
जो आजिवन असुरक्षित रहती हो
अपने अस्तित्व के लिए!

कोई मुझे जल्दी हिला ढूला नहीं सकता
उस जगह
उस वस्तु को
उस इन्सान को
जकड़ लेती हूँ
जब तक अग्नी की लपटों से
भष्म नहीं हो जाती हूँ
या कृत्रिम प्रयोग से
मुझे नष्ट नहीं किया जाता!

मैं मृत पौधों को,लकड़ी,पत्ती,कुड़े,मिट्टी
व जानवरों के गोबर के साथ में
शक्की इन्सानों के
दिमाग को अपना निशाना बना
धीरे- धीरे उन्हें खोखला कर देती हूँ

मैं दिखती नहीं हूँ
पर शंका का बीज के रूप में
हमेशा लोगों जेह़न में पलती हूँ!
कोई अपना घर खुद ही तोड़ लेता
तो कोई हिंसा पे उतारूँ होकर हत्या तक कर बैठता
तो कोई आंतकवादी ही बन जाता
तो कोई सांमप्रदायवाद की आग देश में–
लगा एकता अखण्डता को खंडित करता
कोई अपने ही देश से गद्दारी कर
इमान तक बेच देता!

मैं दीमक तो नहीं हूँ
ना ही कभी किताबी कीड़ा रही
पर कागजी कीड़ा रही हूँ
स्मृति कमजोर होने से
कागजों पर अभियास करती थी
अब भी वही कर रही हूँ
अपनी कविताओं को लिखकर
कागज के कतरन कतरन को
चुन चुन का खा जाती हूँ
कलम की स्याही से काला कर देती हूँ
फिर मोतियों जैसे शक्ल में
सफेद सफेद शब्द उकेर आते है
कविता बनकर!

३) “तुम बिन अस्तित्व में”
मैं वहाँ तक आगे
जाना चाहती हूँ
जहाँ से तुम
मुझसे पीछे ना छूटो!

मैं झट से तुम्हारा
हाथ थाम सकूँ
आवश्यकता पड़ने पे!

मैं कुछ तो हूँ
बस तुम ये समझो
तुम्हारे जाने के बाद भी
अस्तित्वहिन नहीं हुई
मैं अपने अस्तत्वि में हूँ
अपने स्त्रोयोचित गुणों को संभाले!

स्वाभिमान अब भी शेष है मेरा
इसलिए तुम्हारे पीछे पीछे भागने के बजाय
मैंने खुद को स्वंत्रत पहचान बनाई
ना तुम्हें हराना चाहती
ना तुम्हें जीतना चाहती
बस बराबरी चाहती हूँ
परस्पर संबंधों की!

मौलिक रचना
कुमारी अर्चना
जिला-जलालगढ़,
पूर्णियाँ,बिहार
kumariarchana720.ka@gmail.com>

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